मैं चाहता हूँ कि ये जान लो तुम
तुम्हे क्या खबर कि इस ओर हालत क्या है:
गर मैं देखता हूँ चमकीले चांद को,
या देखता हूँ अपनी खिड़की पर धीमे पतझड़ की लाल शाख को,
गर मैं छू लूँ
आग के नज़दीक बिखरी राख को
या लकड़ी के सिकुड़े जिस्म को,
तो ये हर चीज़ मुझे तुम तक ले जाती है,
जैसे कि, खुशबुएं, रौशनी, धातुएं, और हर शय
कोई छोटी नाव हो, जो
ले जाती है मुझे तुम्हारे उन टापूओं की ओर
जो बैठे हैं मेरी प्रतीक्षा में
खैर...
गर धीरे-धीरे तुम अब न चाहो मुझे
तो मैं भी तुमसे चाहत छोड़ दूंगा धीरे-धीरे
गर कभी अचानक
तुम मुझे भूल जाओ
तो फिर तलाश भी न करना मुझे
क्योंकि तब तक मैं भी भुला दूंगा तुम्हें
गर मेरे जीवन में हवाओं की तरह बहती
ये अतीत की परछाइयाँ, उनके सिलसिले
तुम्हें लगते हों बहुत लम्बे.. या लगे मेरा दीवानापन,
और तुम कर लो फैसला
मुझे दिल के साहिल पर छोड़ जाने का,
जहाँ जमा हैं मेरी जड़ें..
तो जान लो कि उसी दिन,
उसी वक़्त
मैं हटा लूँगा अपनी बाहें
और मेरी जड़ें भी निकल पड़ेंगी
दूसरी ज़मीन की तलाश में.
लेकिन
गर हर दिन,
हर वक़्त,
एक अतृप्त मीठे एहसास की तरह
तुम महसूस करो कि हमारी किस्मत में लिखा है एक-दूजे का साथ,
गर हर दिन मुझे सोचते हुए एक फूल खिल जाए तुम्हारे होठों पर,
आह मेरे प्रेम.. मेरे अपने,
तो मुझमें फिर से जल उठेगा वही शोला
न कुछ बुझा होगा मेरे अन्दर ना ही कुछ भुलाया होगा मैंने,
प्रिये! मेरा प्रेम तो पलता है तुम्हारे प्रेम से
इसलिए जबतलक तुम हो,
ये प्रेम भी रहेगा तुम्हारी बांहों में
मेरी बांहों के साथ.

waah acchi kavita hai !
ReplyDeleteThanks Anuj.. Translation is again giving a high :)
DeleteBadhiya anuvaad. Kavita ki khoobsoorti ko banaye rakhta hua...:)
ReplyDeleteशुक्रिया रीनू.. आपके ब्लॉग ने खूब प्रेरित किया था पिछले दिनों. हालाँकि आप कई दिनों से अपडेट नहीं किया है, प्लीज़ जल्दी कीजिये :)
Deleteबहुत अच्छी कविता और अनुवाद भी सुन्दर
ReplyDeleteशुक्रिया भइया :)
Deleteबेहतरीन .... (y)
ReplyDeleteथैंक्स सो मच प्रियंका.. तुमने शेयर भी किया था, मुझे बहुत खुशी हुई सच में :)
DeleteBeautiful
ReplyDeleteबढ़िया है।
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