मुझे पसंद है तुम्हारी ख़ामोशी, जैसे तुम मौजूद ही नहीं
और सुन रही हो मुझे बहुत दूर से कहीं,
पर नहीं छू पा रही है मेरी सदा तुमको
यूँ लगता है कि उड़ान भर ली हों तुम्हारी पलकों ने
यूँ लगता है कि एक बोसे ने मुहरबंद कर दिया हो तुम्हारे होठों को.
क्योंकि इनसब चीजों पर तारी है मेरी आत्मा का साया
क्योंकि इनसब चीजों पर तारी है मेरी आत्मा का साया
इसलिए तुम भी भरी हुई हो मेरी आत्मा की मौजूदगी से
तुम मेरी रूह का ही तो अक्स हो,
जैसे किसी तितली का स्वप्न
और तुम दिखती हो गहरे शोक के किसी शब्द सी.
मुझे पसंद है तुम्हारी ख़ामोशी, जैसे तुम दूर हो.
दूर से आती एक कराह हो तुम, जैसे किसी तितली के कंठ से निकली एक आवाज़
तुम सुन रही हो मुझे बहुत दूर से कहीं,
और नहीं पहुँच रही है मेरी सदा तुम तक
इसलिए अपने मौन के असर से, अब ख़ामोश हो जाने दो मुझे भी
और बातें कर लेने दो मुझे तुम्हारी ख़ामोशी से
जो रौशनी सी निर्मल है और जिसने खींच दिया है मेरे चारों ओर एक पवित्र
घेरा.
तुम रात सी हो, शांत और नक्षत्रों के साथ अपनी विराटता में मौजूद.
तुम्हारी ख़ामोशी एक सितारे सी है, जो बहुत दूर तो है पर उतनी ही सत्य
भी
मुझे पसंद है तुम्हारा ख़ामोशी, जैसे तुम मौजूद ही नहीं, जैसे तुम दूर
हो और उदास हो
जैसे तुम मृत हो
जैसे तुम हो ही नहीं.
उस पल सिर्फ एक शब्द, सिर्फ एक मुसकान ही काफ़ी होगी
और मैं सिहर उठूँगा
ये सोचकर: कि जो मैंने सोचा वो सच नहीं.
