निज़ार क़ब्बानी
विश्व कविता में
निज़ार क़ब्बानी (21 मार्च 1923- 30 अप्रैल 1998) का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. वे सीरिया
(प्राचीन नाम 'लेवान्ता', राजधानी 'दमिश्क') के नागरिक थे. कई
सालों तक उन्होंने राजनयिक के रूप में सीरिया को अपनी सेवाएं प्रदान की और बीस साल
के अपने कार्यकाल के दौरान काहिरा, बेरुत, इस्तांबुल, मैड्रिड, लन्दन, चीन आदि देशों में
रहे. इससे इतर वे एक कवि और प्रकाशक भी थे. क़ब्बानी ने अरब के अदीबों में ऊंचा
मक़ाम हासिल किया और अपने समाज को देखते हुए काफी निर्भीक लेखन किया. संवेदनशीलता
और भावनाओं की सहजता उनकी कविताओं के प्रमुख तत्व हैं. उन्होंने प्रेम, रूमान, नारीवाद, अरब की दशा और अपनी सरज़मीं पर हुए जुल्म पर बहुत
गहरी कवितायेँ लिखीं हैं. आक्रोश की जगह उनके स्वर में कहीं आशा कहीं निराशा की
धूप-छाँव हैं. रुदन है, उदासी का आलाप है लेकिन एक सकारात्मक उम्मीद है
जो किसी भी हाल में ढलती नहीं. इन कविताओं में एक सहज आकर्षण है, जो भाषाओँ के पुलों को पार करता हुआ जबहम तक
पहुँचता है तब भी ख़ालिस ही रहता है, संवेदनाएं वैसी ही
सशक्त रहती हैं जैसी कविता के जन्म के समय थीं. रफ़्ता रफ़्ता ये कवितायेँ दर्ज होती
गयीं मन के किसी एकांत में और एक दिन सहसा माँग कर बैठीं मेरी अपनी भाषा में ढलने
की. ये कवितायेँ अपना अनुवाद स्वयं करवाती हैं, शब्दों का चयन खुद
करती हैं, इन कविताओं में आत्मा का करुण गान है जिसने ऐसा
संभव किया और माध्यम के रूप में मुझे चुना. स्त्रीविमर्श पर लिखी गयी उनकी कवितायेँ
उस समय की शायद सबसे अधिक क्रांतिकारी कवितायेँ थीं. क़ब्बानी व्यवस्था से टकराव की
जगह करुण गुहार करते हुए कवि थे जो स्त्रियों के उत्थान के लिए संघर्षरत थे और
अपनी कविता के माध्यम से उनकी संवेदनाओं, भावनाओं को प्रकट
करके उनके हक़ में आवाज़ उठाते थे. क़ब्बानी के शब्दों में अरब समाज की औरतों की कराह
की धुन घुली हुई थी, उनके दर्द का अक्स दिखता था और उनकी झेली यातनाओं
का पूरा संसार मौजूद था.
स्त्री केन्द्रित
कविताओं का कारण क़ब्बानी के जीवन की कुछ प्रमुख त्रासदियों में निहित है. क़ब्बानी
के नौजवान दिनों में ही उनकी सत्रह वर्ष की बहन ने ख़ुदकुशी कर ली थी क्योंकि वह उस
युवक से प्रेम नहीं करती थी जिसे उसके लिए चुना गया था. इस घटना से क़ब्बानी को
गहरा मानसिक आघात लगा था और बाद में आघात का यही स्वर और आर्तनाद उनकी कविताओं में
पिघल कर नुमायाँ हुआ था.
निज़ार ने दो शादियाँ
की और वे अपनी दूसरी बीवी बिल्कीस-अल-रवी से बेतरह मोहब्बत करते थे. 1982 में
बेरुत स्थित ईरानी एम्बेसी में हुए बम धमाके ने उनकी बीवी को उनसे छीन लिया और इस
तरह जीवन की इन जटिल, मार्मिक घटनाओं का ख़ासा प्रभाव उनकी कविताओं में
उतर कर आता है.
दमिश्क से दूर रहने के
दौरान उन्होंने अपनी सरज़मीं से लगाव पर कई बेहद भावुक कवितायेँ लिखीं, और उस पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाते
रहे. हालिया गाजा प्रकरण के हवाले से उनके द्वारा लिखी कविता ‘येरुशलम’ बेहद प्रासंगिक हो
उठी है. 1967 में अरब –इज़रायल युद्ध में अरब की हार के बाद से वे लन्दन
में रहने लगे थे और निज़ार क़ब्बानी पब्लिशिंग हाउस के माध्यम से अरब के रंज और मातम
को विश्व के सामने लाते रहे. जीवन के उत्तरार्ध में लिखी कविताओं में उन्होंने
तानाशाही के दंश को शब्दों में ढाला है ख़ासकर इन पंक्तियों में यह पूरी रवानी के
साथ उभर कर आया है
‘ओ सुलतान, मेरे मालिक, अगर मेरे बदन के कपड़े फटे हैं, तो ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि आपके कुत्ते आज़ाद
हैं, अपने पंजों से मुझे नोच डालने के लिए....’
यहाँ उनकी एक छोटी कविता पेश ए नज़र है
प्रेम में
प्रेम में
जब मैं प्रेम में होता हूँ
तो मुझे लगता है
जैसे मैं वक़्त का सरताज हूँ
धरती और इस पर मौजूद हर चीज
मेरे अधिकार में है
और अपने घोड़े पर सवार मैं
जा सकता हूँ सूरज तक
जब मैं प्रेम में होता हूँ तो
हो जाता हूँ आँखों के लिए अदृश्य
किसी तरल रौशनी सा
और मेरी डायरी में दर्ज कवितायेँ
तब्दील हो जाती हैं
पीले और लाल फूल से भरे खेतों में
जब मैं प्रेम में होता हूँ तो
मेरी उँगलियों से फूट पड़ती है
जल की धार
और जीभ पर उग आती है हरी घास
जब मैं प्रेम में होता हूँ तो
मैं हो जाता हूँ समस्त समय से बाहर
एक समय
जब मैं किसी
स्त्री के प्रेम में होता हूँ
तो सारे पेड़
दौड़ पड़ते हैं मेरी ओर
नंगे पाँव..

वाह.... वैसे मुझे अफजाल अहमद सैयद को पढ़ते हुए निजार कब्बानी बहुत याद आते हैं. उन्हें भी पढ़ना. औरहाँ, अंतिम पंक्ति में स्त्री स्ट्रे हो गयी है (सिम्बोलिकाली अच्छा लगा स्त्री का स्ट्रे करना पर कविता में ठीक कर दो.
ReplyDeleteबढ़िया बहुत बढ़िया :)
ReplyDeleteJiyo ..
ReplyDeleteयह कविता मुझे बहुत पसंद है .भावना शुक्रिया!
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