Apr 29, 2015

निज़ार क़ब्बानी

(1)
‘गर्मियों में’

गर्मियों में 
तुम्हारे ख़यालों में घिरा
लेटा रहता हूँ मैं साहिल पर 

अगर कभी कह दूँ मैं सागर को 
कि किस तरह चाहता हूँ तुम्हें 

तो वो छोड़ देगा अपने साहिल को 
अपनी सीपियों और मछलियों को भी छोड़कर 
चल देगा मेरे पीछे-पीछे.

(2)
‘तुम्हे चूमते हुए हरबार’
तवील जुदाई के बाद 
जब भी चूमता हूँ तुम्हें 
खुद को इतना उतावला महसूस करता हूँ 
जैसे कोई प्रेमी बेचैन हो 
अपनी चिट्ठी को
लाल डब्बे में डाल देने के लिए.

(3)
‘मेरे महबूब’
मेरी महबूब 
गर तुम भी मेरे प्यार में 
मेरी तरह पागल होती 
तो फेंक आती अपने सारे गहने 
बेच आती कंगन 
और सुकून से सो जाती मेरी आँखों में.

(4)
‘लैम्प और रौशनी’

लैम्प से ज़्यादा ज़रूरी है रौशनी 
जैसे नोटबुक से ज़्यादा ज़रूरी है कविता 
और लबों से ज़्यादा ज़रूरी है बोसा.
जो ख़त मैंने तुम्हें लिखे हैं 
वे हमारे वज़ूद से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं 
सिर्फ़ ये ख़त ही तो वो दस्तावेज़ हैं 
जहाँ लोग खोज सकेंगे 
तुम्हारी ख़ूबसूरती 


और मेरे पागलपन को 
(5)
‘मेरे महबूब ने पूछा’

मेरे महबूब ने पूछा मुझसे 
कि “क्या फर्क है मुझमें और आसमान में?”
मैंने कहा.. मेरी जान फ़र्क ये है कि 
जब तुम हंसती हो 
तो 
मैं भूल जाता हूँ आकाश को.

(6)

‘आज़माइश’
पूरब तक पहुँचते हैं मेरे गीत
कुछ उनकी तारीफ़ करते हैं
और कुछ भेजते हैं कोसने
मैं कृतज्ञ होता हूँ उन सब के प्रति
क्योंकि मैंने हर उस औरत के 
रक्त का बदला लिया है जो मारी गयी है 
और डरी हुई औरतों को मैंने दी है पनाह
उन गीतों में
मैंने साथ दिया है 
औरतों के बाग़ी दिलों का 
और तैयार हूँ इस ख़ातिर कोई भी कीमत चुकाने को
मर जाने में मुझे सुकून है 
गर मेरी जान मोहब्बत में जाए तो 
क्योंकि मैं प्रेम का हिमायती हूँ 
और जो मैं ये न हुआ 
तो मैं नहीं रह जाऊँगा ‘मैं’.