परिचय लिखना अपने होने को अंडरलाइन करने जैसा ही होगा. हालाँकि मैं अपने अस्तित्व को अंडरलाइन करने लायक तवज्जो शायद न देना चाहूँ. प्रयास के बावजूद भी यह होना ज़रा मुश्किल ही होता है कि आप सबके साथ जीते-खाते-रहते हुए भी यूँ रह सकें कि कोई निग़ाह किसी जिज्ञासावश आपनी ओर न उठे. इसके लिए लम्बे समय तक मौन रहकर खूब सारी धूल को जमने देना होता है अपने ‘होने’ पर. समय बीतने की गति से कई गुना ज्यादा गति के साथ पुराना होना पड़ता है और फिर अदृश्य भी. लेकिन किसी दिन ऐसे ही परिचय के माध्यम से अंडरलाइन होने की गुस्ताखी आपके उस लम्बे के समय सारे प्रयासों को निरर्थक सिद्ध कर देती है.
इसलिए मेरा परिचय लगभग वही है जो मेरे जैसी तमाम औरतों का है. जो अपना परिचय देने में इसलिए भी संकोच करेंगीं कि वो शायद बहुत प्रभावी न लगे सुनने में, शायद कुछ विरोधाभास भी हो उसमें, शायद उसमें मायूसी और असंतोष के शब्द छिटके पड़े मिल जाएँ, शायद वो कुछ सवाल पैदा कर दे सामने वाले के मन में, जैसे गणित और अर्थशास्त्र पढ़ने वाली ये लड़की अगर कविता के चक्कर में पड़ी ती इसके पीछे क्या दिलचस्प किस्सा हो सकता है, कि क्यों किसी अंग्रेज़ी कंपनी की नौकरी के बाद भी इसे लगता है कि यहाँ इसके होने और पनपने के लिए उपयुक्त खाद-पानी मिलेगा, कि क्यों इसे लगता है जो बेनाम अधूरापन है वो दरअसल अपने आत्म की तलाश है, क्यों इसे लगता है कि जो विज्ञान के तमाम समीकरण नहीं समझा पाते उसे कविता आत्मा पर अंकित कर देती है कुछ ही शब्दों में..
बात सिर्फ़ इतनी सी है कि मैं वैसी ही हूँ जैसी मेरे मोहल्ले में कतारों में सजे घरों में रहने वाली कई औरतें हैं. सुबह से रात तक जो गृहस्थी में उलझी होती हैं और बीच-बीच में छोटे अंतराल निकालकर झाँक लेती हैं अपने अन्दर, टटोलती रहती हैं मन को, कि वो क्या है जो इसे बेचैन करता है जबकि सब काम अपने समय और गति के अनुसार होते चले जा रहे हैं. ऐसे ही खाली समय में वो निहारती हैं अपनी हथेलियों को और उनकी आँखों से झांकते हैं मूक प्रश्न, वो तलाशती हैं जवाब रेखाओं के उस अंतरजाल में जिसकी न लिपि जानती हैं न व्याकरण...
रेखाएं
__________ एक_______
कुछ रोज़ देखी जाने वाली
चीजों में शामिल हैं
हथेलियाँ
जिनकी पड़ताल
हम करते हैं बेनागा
पर क्या हम स्पष्ट देख पाते हैं
इनमें होने वाले बदलाव
क्या हमें खबर होती है
कि हथेली की कौन सी रेखा
हो गयी है और भी गहरी
या हम जान पाते हैं कभी
इन रेखाओं के बढ़ने
और घटने को
संभवतः कोई नहीं बता सकेगा
कि पिछले दिन की तुलना में
कितनी और नई रेखाओं ने
कब्ज़ायी है हथेलियों की ज़मीन
यह सत्य है कि...
हम नितांत अनजान
होते हैं
रोज़ दिखने वाली
चीजों के प्रति भी
_________ दो__________
कुछ गहरी सी लगी आज
मेरी हथेली पर रहने वाली ह्रदय-रेखा
और जीवन-रेखा के समान्तर
चलने लगी है एक और जीवन-रेखा
क्यों अचानक कम हुई सी लगीं
छोटी-छोटी उलझनों की लकीरें
और हथेली में ही कहीं विलीन हो गयी
भाग्य रेखा
कैसा संकेत है यह?
हैरान थी मैं देखकर
हथेलियों का यह बदलाव
कि तभी याद आया..,
बीती शाम तुमने थामा था मेरा हाथ..
_________ तीन__________
मेरी हथेली पर
तुम्हारी रेखा स्थायी नहीं है
और मेरे जीवन में तुम!
हर रात खींचती हूँ
हथेली पर इक लकीर
क्योंकि उम्मीद की इक नाव
अब भी तैर रही है
संवेदनाओं के तरल में
तुम बारिश के सूरज की तरह
अनिश्चित
और मैं पर्वत सी अटल
तुम्हारी प्रतीक्षा
से उपजी आकुलता
प्रतिध्वनित होती है हर क्षण
मेरी साँसों में
और कहती है
सच में .. खानाबदोश
हो तुम !
----------------चार----------------------
कैसे समा जाता है
यह सुदीर्घ जीवन
एक छोटी सी हथेली में
ये आड़ी-तिरछी रेखाएं
कितना कुछ कहती हैं
अपनी गूढ़ भाषा में
कैसी होती हैं इनकी भंगिमाएं
कहीं जैसे कोई बात अधूरी छोड़कर
सुस्ताने बैठ गयी हो
एक महीन रेखा
और कहीं यूँ लगता है जैसे
अपना ही कहा काट गयी
हो कोई गहरी रेखा
अनेक प्रेममय क्षण
मुसकाते हैं शुक्र पर्वत की छाया में
और शनि-मंगल ने
ह्रदय रेखा तक फैला रखा है अपना प्रकोप
ताप-संताप
मिलन-विरह
और न जाने कितने ही
परिवर्तनों का इतिहास
दर्ज है इन हथेलियों
पर भूगोल बनकर
कि हम अपने
हाथों में लेकर घूमे रहे हैं
अपने जीवन का नक्शा
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भावना