यरूशलेम
मैं रोया अपने आंसूओं के सूख जाने तक
मोमबत्तियों के बुझ जाने तक मैंने की दुआ
झुका रहा सजदे में जब तक दरकने न लगी ज़मीन
मैंने पूछा मोहम्मद और ईसा के बारे में
ओ यरूशलेम, जिसकी हवा में है पैगम्बरों की
ख़ुशबू
जहाँ से सबसे क़रीब है जन्नत
ओ यरूशलेम, दीन के गढ़
एक ख़ूबसूरत बच्चे से तुम,
झुलस गयी हैं जिसकी
उंगलियाँ और झुकी हैं निगाहें
तुम गर्म रेगिस्तान के बीच वह सरसब्ज़ ज़मीन हो
जहाँ से गुज़रते हैं पैगम्बर
आज उदासी पड़ी हैं तुम्हारी गलियां
मातम करती हैं मीनारें
यूँ लगते हो तुम कि किसी जवान लड़की ने पहने हों
काले मातमी कपड़े
कहो.. शनिवार की सुबह
कौन बजाता है चर्च में यीशु के जन्म की घंटियाँ?
क्रिसमस की शाम कौन लाता है बच्चों के लिए खिलौने?
ओ यरूशलेम, शोक में डूबे शहर
जैसे आँखों में तैरता एक मोटा आंसू
जिसके बगैर बेनूर है मज़हबों का वज़ूद
कौन रोकेगा तुम पर होती इस जरहियत को?
तुम्हारी खून से लथपथ दीवारें कौन धोएगा?
कौन करेगा बाइबिल की हिफाज़त?
कौन बचाएगा क़ुरान को?
ईसा की रक्षा कौन करेगा?
और कौन बचाएगा इंसान को?
ओ यरूशलेम, मेरी सरज़मीं
ओ यरूशलेम, मेरी जावेदा मोहब्बत
कल फिर फूलेंगे नींबू के पौधे
और खुशी से झूम रहे होंगे जैतून
तुम्हारी आँखें रक्स करेंगीं
और लौट आएँगे मुहाजिर कबूतर
तुम्हारी मुक़द्दस छतों पर
तुम्हारी सुहानी पहाड़ियों पर
फिर से खेलेंगे तुम्हारे बच्चे
और एक दूजे से मिलेंगे बिछड़े हुए
बाप-बेटे
मेरी सरज़मीं में फिर से होगा अमन
और उगेंगे जैतून.* * *
