Nov 29, 2014

माँ को लिखे पांच ख़त

नौकरी के सिलसिले में निज़ार को ज़्यादातर अपने घर से दूर ही रहना होता था. इस दूरी ने लगाव को और भी गहरा किया था. वो दमिश्क में न थे लेकिन दमिश्क उनके भीतर सासें लेता था. वहां की पुरकैफ़ हवायें, उस शहर का पुरानापन, इमारतें सबकुछ एक चलचित्र की तरह  गुज़रता रहता था उनके भीतर लम्हा दर लम्हा. किसी अनवरत याद की शक्ल में..  शायद ऐसी ही यादों के भँवर से घिरे जाने पर उन्होंने किसी रोज़ लिखी होंगीं ये चिट्ठियां  'माँ को लिखे पांच ख़त'

इस ख़त के दो टुकड़े यहाँ कतरन पर



माँ 


किसी पीर सी निश्चल मेरी प्यारी माँ को
इस ख़ूबसूरत सुबह का सलाम भेजता हूँ
दो बरस हो गए माँ
जब ये लड़का निकल गया था
किसी समुद्री जहाज में बैठकर
अपनी काल्पनिक यात्रा के लिए.
उस बात को दो बरस हो गए माँ
जब उसने अपने सामान में छिपा कर रखी थी
अपने वतन की हरियाली भरी सुबह,
वहां की रात के सितारे, नदियाँ,
और दूर तक फैले खसखस के
ढेर सारे लाल फूल.
दो बरस हुए माँ जब वह अपने कपड़ों में
छुपा कर लाया था
पुदीने और अजवायन के गुच्छे
और दमिश्क का एक नीला फूल.

***





अकेला मैं 



मैं अकेला हूँ.
मेरी सिगरेट से उठता धुँआ उकताया हुआ है,
और वह जगह भी मुझसे ऊबी हुई है, जहाँ मैं बैठा हूँ
मेरे दुःख चिड़ियों के झुण्ड की तरह खोज रहे हैं 
इस मौसम में उगने वाले अनाज के खेत.
मैंने यूरोप की औरतों को जाना है
मैं जान पाया हूँ उनकी क्लांत सभ्यता को
मैंने भारत घूमा और चीन देखा,
दुनिया का पूरा पूर्वी हिस्सा घूम लिया मैंने, और कहीं भी मुझे न मिली
एक ऐसी औरत जो मेरे सुनहरे बालों में कंघी फिरा दे
ऐसी औरत जो अपने बटुए में छिपा कर रखती एक टाफी मेरी खातिर
औरत, जो गिरने पर मुझे उठा लेती
और बदन पर कपड़े न होने पर
मुझे पहना देती कपड़े
माँ: तेरा ये बेटा जो समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा था
आज भी उस टाफी के लिए तरसता है.
इसलिए माँ, भला कैसे मैं एक पिता बन जाऊं,
जबकि मैं खुद ही ठहरा हूँ अपने बचपन में.

मैड्रिड की ज़मीन से सुबह का सलाम भेजता हूँ
‘फुलाह’ कैसी है?
मैं आपसे मिन्नत करता हूँ उसका ख़याल रखियेगा
सारे बच्चों में सबसे प्यारी
अब्बू कितना चाहते थे उसे
दुलार में उसे यूँ बिगाड़ रखा था जैसे वह उनकी बेटी हो
सुबह कॉफ़ी पीते वक़्त वे उसे अपने पास बुला लेते थे
वो खुद उसे खाना खिलाते थे और पानी भी खुद ही पिलाते थे
उनकी करुणा का साया हमेशा उसपर बना रहता था
जब अब्बू गुज़र गए
वो हमेशा उनके लौट आने के ख्व़ाब देखती थी
कमरों के कोनों में उन्हें खोजा करती थी
पूछती थी उनके रोब और अखबार के बारे में
और गर्मियों के आने पर, अब्बू की आँखों के नीले
रंग के बारे में सवाल करती थी
सोचती थी कि वह अब्बू की हथेलियों में फिर दे सके 
अपने सुनहरे सिक्के.

***

(बचे तीन ख़त अगली किश्त में) 




Nov 28, 2014

एक पागल औरत की चिट्ठी



(1).



मेरे आक़ा
ये एक पागल औरत की ओर से लिखी गयी चिट्ठी है
क्या मुझसे पहले भी किसी पागल औरत ने आपको ख़त लिखा है?
मेरा नाम? छोड़िये, नामों को किनारे करते हैं
रनिया या ज़ैनब
या हिन्द या हायफ़ा
मेरे आक़ा, जो सबसे बेहूदा चीज़ हम अपने साथ लिए फिरते हैं- 
वो ये नाम ही तो हैं


(2).


मेरे आका,
मैं खौफ़ खाती हूँ अपने मन की बात आपसे कहने में
मुझे खौफ़ है कि - गर मैंने कहा तो - आग लग जाएगी जन्नतों में 
क्योंकि मेरे आका, पूरब के इस हिस्से में 
ज़ब्त कर ली जाती हैं नीली चिट्ठियाँ
ज़ब्त कर लिए जाते हैं सपने औरतों के सीने में संजोये 
कुचल दिया जाता है यहाँ औरतों के जज़्बात को 
यहाँ चाकुओं और छुरों 
की ज़बान में बात की जाती है 
औरतों से 
यहाँ क़त्ल कर दिया जाता है 
वसंत का, प्रेम का और काली गुँथी चोटियों का 
और पूरब के इस हिस्से में मेरे आका 
उन्हीं औरतों के सर की हड्डियों से 
बनाया जाता है पूरब का हसीन ताज़ 



(3).



मेरे आक़ा
मेरी खराब लिखावट देखकर नाराज़ न हों
क्योंकि इधर मैं आपको ये ख़त लिख रही हूँ
और उधर मेरे दरवाज़े के पीछे लटक रही है श्मशीर
इस कमरे के बाहर हवा की सरसराहट और कुत्तों की आवाजों की गूँज है
मेरे आक़ा!
अंतर् अल अब्स मेरे दरवाज़े के पीछे खड़ा है!
गर उसने ये ख़त देख लिया तो
कसाई की मानिंद वह मेरे टुकड़े कर डालेगा
वो मेरा सर क़लम कर देगा
गर मैंने अपनी यातनाओं के बारे में कुछ कहा तो
गर उसने देख लिए मेरे झीने कपड़े
तो धड़ से अलग कर देगा वो मेरा सर
क्योंकि मेरे आक़ा, पूरब के इस हिस्से में,
औरतें घिरी रहती हैं भालों की नोंक से
और मेरे आक़ा, तुम्हारा पूरब 
मर्दों को तो पैगम्बर बना देता है
और औरतों को दफ़ना देता है धूल में


(4).



नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
इन सफ़ों को पढ़कर
नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
अगर सदियों से बंद शिकायतों को मैं तहस-नहस कर दूँ 
गर मैं बाहर आ जाऊं अपनी बेहोशी से
गर मैं भाग जाऊं...
किले के हरम में बने गुम्बदों से
गर मैं बग़ावत कर दूँ अपनी मौत के ख़िलाफ़...
अपनी कब्र, अपनी जड़ों के ख़िलाफ़...
और उस विकराल कसाईखाने के ख़िलाफ़...

नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
अगर मैं आपसे कह देती हूँ अपने दिल की बातें
क्योंकि पूरब में बसने वाले आदमी
का कोई सरोकार नहीं नज़्म और जज़्बात से
गुस्ताख़ी माफ़ मेरा आक़ा- पूरब का आदमी-
कुछ नहीं समझता औरत को
बिस्तर से परे


(5).



मुझे माफ़ करिए मेरे आक़ा! 
गर मैंने मर्दों  के साम्राज्य पर हमले की गुस्ताख़ी की है
क्योंकि पूरब का महान अदब
वास्तव में सिर्फ मर्दों का अदब है
और यहाँ प्रेम हमेशा से
मर्दों के हिस्से में ही आया है
यहाँ कामवासना एक दवा की तरह
सिर्फ मर्दों को ही बेची जाती हैं

हमारे देश में औरतों की आज़ादी का ख़याल
एक बेवकूफ़ाना परीकथा जैसा है
क्योंकि इस देश में
मर्दों की आज़ादी से इतर
कोई आज़ादी नहीं होती

मेरे आक़ा
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता, जो भी आपके जी में आये, आप कह लें मुझे:
कि मैं ओछी हूँ.. पागल हूँ.. सनकी हूँ.. कम अक्ल हूँ..
मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगेगा..
क्योंकि जो भी औरत लिखती है अपने सरोकारों की बात
उसे मर्दों का तर्क
पागल औरत ही मानता है
और क्या मैंने शुरुआत में ही आपसे नहीं कह दिया 
कि मैं एक पागल औरत हूँ?





Nov 27, 2014

प्रेम में


निज़ार क़ब्बानी



विश्व कविता में निज़ार क़ब्बानी (21 मार्च 1923- 30 अप्रैल 1998) का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. वे सीरिया (प्राचीन नाम 'लेवान्ता', राजधानी 'दमिश्क') के नागरिक थे. कई सालों तक उन्होंने राजनयिक के रूप में सीरिया को अपनी सेवाएं प्रदान की और बीस साल के अपने कार्यकाल के दौरान काहिरा, बेरुत, इस्तांबुल, मैड्रिड, लन्दन, चीन आदि देशों में रहे. इससे इतर वे एक कवि और प्रकाशक भी थे. क़ब्बानी ने अरब के अदीबों में ऊंचा मक़ाम हासिल किया और अपने समाज को देखते हुए काफी निर्भीक लेखन किया. संवेदनशीलता और भावनाओं की सहजता उनकी कविताओं के प्रमुख तत्व हैं. उन्होंने प्रेम, रूमान, नारीवाद, अरब की दशा और अपनी सरज़मीं पर हुए जुल्म पर बहुत गहरी कवितायेँ लिखीं हैं. आक्रोश की जगह उनके स्वर में कहीं आशा कहीं निराशा की धूप-छाँव हैं. रुदन है, उदासी का आलाप है लेकिन एक सकारात्मक उम्मीद है जो किसी भी हाल में ढलती नहीं. इन कविताओं में एक सहज आकर्षण है, जो भाषाओँ के पुलों को पार करता हुआ जबहम तक पहुँचता है तब भी ख़ालिस ही रहता है, संवेदनाएं वैसी ही सशक्त रहती हैं जैसी कविता के जन्म के समय थीं. रफ़्ता रफ़्ता ये कवितायेँ दर्ज होती गयीं मन के किसी एकांत में और एक दिन सहसा माँग कर बैठीं मेरी अपनी भाषा में ढलने की. ये कवितायेँ अपना अनुवाद स्वयं करवाती हैं, शब्दों का चयन खुद करती हैं, इन कविताओं में आत्मा का करुण गान है जिसने ऐसा संभव किया और माध्यम के रूप में मुझे चुना. स्त्रीविमर्श पर लिखी गयी उनकी कवितायेँ उस समय की शायद सबसे अधिक क्रांतिकारी कवितायेँ थीं. क़ब्बानी व्यवस्था से टकराव की जगह करुण गुहार करते हुए कवि थे जो स्त्रियों के उत्थान के लिए संघर्षरत थे और अपनी कविता के माध्यम से उनकी संवेदनाओं, भावनाओं को प्रकट करके उनके हक़ में आवाज़ उठाते थे. क़ब्बानी के शब्दों में अरब समाज की औरतों की कराह की धुन घुली हुई थी, उनके दर्द का अक्स दिखता था और उनकी झेली यातनाओं का पूरा संसार मौजूद था.
स्त्री केन्द्रित कविताओं का कारण क़ब्बानी के जीवन की कुछ प्रमुख त्रासदियों में निहित है. क़ब्बानी के नौजवान दिनों में ही उनकी सत्रह वर्ष की बहन ने ख़ुदकुशी कर ली थी क्योंकि वह उस युवक से प्रेम नहीं करती थी जिसे उसके लिए चुना गया था. इस घटना से क़ब्बानी को गहरा मानसिक आघात लगा था और बाद में आघात का यही स्वर और आर्तनाद उनकी कविताओं में पिघल कर नुमायाँ हुआ था.
निज़ार ने दो शादियाँ की और वे अपनी दूसरी बीवी बिल्कीस-अल-रवी से बेतरह मोहब्बत करते थे. 1982 में बेरुत स्थित ईरानी एम्बेसी में हुए बम धमाके ने उनकी बीवी को उनसे छीन लिया और इस तरह जीवन की इन जटिल, मार्मिक घटनाओं का ख़ासा प्रभाव उनकी कविताओं में उतर कर आता है. 

दमिश्क से दूर रहने के दौरान उन्होंने अपनी सरज़मीं से लगाव पर कई बेहद भावुक कवितायेँ लिखीं, और उस पर होने वाले जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे. हालिया गाजा प्रकरण के हवाले से उनके द्वारा लिखी कविता येरुशलमबेहद प्रासंगिक हो उठी है. 1967 में अरब इज़रायल युद्ध में अरब की हार के बाद से वे लन्दन में रहने लगे थे और निज़ार क़ब्बानी पब्लिशिंग हाउस के माध्यम से अरब के रंज और मातम को विश्व के सामने लाते रहे. जीवन के उत्तरार्ध में लिखी कविताओं में उन्होंने तानाशाही के दंश को शब्दों में ढाला है ख़ासकर इन पंक्तियों में यह पूरी रवानी के साथ उभर कर आया है 
ओ सुलतान, मेरे मालिक, अगर मेरे बदन के कपड़े फटे हैं, तो ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि आपके कुत्ते आज़ाद हैं, अपने पंजों से मुझे नोच डालने के लिए....




यहाँ उनकी एक छोटी कविता पेश ए नज़र है

                        
                         प्रेम में 


                         

जब मैं प्रेम में होता हूँ 
तो मुझे लगता है 
जैसे मैं वक़्त का सरताज हूँ 
धरती और इस पर मौजूद हर चीज 
मेरे अधिकार में है
और अपने घोड़े पर सवार मैं 
जा सकता हूँ सूरज तक 

जब मैं प्रेम में होता हूँ तो 
हो जाता हूँ आँखों के लिए अदृश्य 
किसी तरल रौशनी सा 
और मेरी डायरी में दर्ज कवितायेँ 
तब्दील हो जाती हैं 
पीले और लाल फूल से भरे खेतों में 

जब मैं प्रेम में होता हूँ तो 
मेरी उँगलियों से फूट पड़ती है 
जल की धार 
और जीभ पर उग आती है हरी घास 
जब मैं प्रेम में होता हूँ तो 
मैं हो जाता हूँ समस्त समय से बाहर 
एक समय 

जब मैं किसी
स्त्री के प्रेम में होता हूँ 
तो सारे पेड़ 
दौड़ पड़ते हैं मेरी ओर 
नंगे पाँव.. 









Nov 15, 2014

मुझे पसंद है तुम्हारी ख़ामोशी



मुझे पसंद है तुम्हारी ख़ामोशी, जैसे तुम मौजूद ही नहीं   
और सुन रही हो मुझे बहुत दूर से कहीं,
पर नहीं छू पा रही है मेरी सदा तुमको
यूँ लगता है कि उड़ान भर ली हों तुम्हारी पलकों ने
यूँ लगता है कि एक बोसे ने मुहरबंद कर दिया हो तुम्हारे होठों को.
क्योंकि इनसब चीजों पर तारी है मेरी आत्मा का साया
इसलिए तुम भी भरी हुई हो मेरी आत्मा की मौजूदगी से
तुम मेरी रूह का ही तो अक्स हो,
जैसे किसी तितली का स्वप्न
और तुम दिखती हो गहरे शोक के किसी शब्द सी.
मुझे पसंद है तुम्हारी ख़ामोशी, जैसे तुम दूर हो.
दूर से आती एक कराह हो तुम, जैसे किसी तितली के कंठ से निकली एक आवाज़
तुम सुन रही हो मुझे बहुत दूर से कहीं,
और नहीं पहुँच रही है मेरी सदा तुम तक

इसलिए अपने मौन के असर से, अब ख़ामोश हो जाने दो मुझे भी
और बातें कर लेने दो मुझे तुम्हारी ख़ामोशी से
जो रौशनी सी निर्मल है और जिसने खींच दिया है मेरे चारों ओर एक पवित्र घेरा.

तुम रात सी हो, शांत और नक्षत्रों के साथ अपनी विराटता में मौजूद.
तुम्हारी ख़ामोशी एक सितारे सी है, जो बहुत दूर तो है पर उतनी ही सत्य भी
मुझे पसंद है तुम्हारा ख़ामोशी, जैसे तुम मौजूद ही नहीं, जैसे तुम दूर हो और उदास हो
जैसे तुम मृत हो
जैसे तुम हो ही नहीं.

उस पल सिर्फ एक शब्द, सिर्फ एक मुसकान ही काफ़ी होगी 
और मैं सिहर उठूँगा 
ये सोचकर: कि जो मैंने सोचा वो सच नहीं. 



Nov 9, 2014

जब बड़े हो जाना तो पढ़ना




















मेरी थोड़ी सी बड़ी हथेली में एक थोड़ी सी छोटी हथेली को महसूस करने का जो सुख है वो ही फिलहाल ज़िन्दगी का सबसे बड़ा लालच है. तुम एक एक दिन करके बढ़ते हो और मैं एक एक दिन कर के घटती हूँ. सोचो तो.. मुझे ख़याल भी न रहा कि कब से मैंने अपनी ज़िन्दगी की गिनती उलटी गिननी शुरू कर दी, कब मैं एक एक दिन बढ़ने की बजाय, एक एक दिन घटने लगी. ये शायद तब से ही हुआ, जब साल 2007 में नवंबर महीने की एक नर्म शाम को तुम आ गए थे हमेशा साथ रहने के लिए. वो शाम भी ऐसी थी कि साल में एक बार ही आती है. आसमान रौशन हो जाता है पटाखों से, घर रौशन हो जाते हैं दीयों की जगमग से और तुमने उस दिन हमारे मन रौशन कर दिये थे. कुल दीपक नहीं एक अखंड दीपक हो तुम हम सबके जीवन में.

ये भी कैसा सच है कि हमें अपनी ज़िन्दगी से तब ज़्यादा प्यार होने लगता है जब कोई और ज़िन्दगी उससे जुड़ जाती है. शायद तब पहली बार ऐसा होता है कि अपनी लम्बी उम्र के लिए दुआएं मांगने का मन हो बैठता है. माँ-पापा एक नए सिरे से खुद का ख़याल रखने लगते हैं, बच्चे के आ जाने पर. पापा अचानक बाइक चलाते वक़्त स्पीड बढ़ाना बंद कर देते हैं. जब इतने से ही सुकून नहीं आता तो बाइक ही किसी और को दे देते हैं. एडवेंचर की जगह सेक्योरिटी आ जाती है, और बाइक से दूर दूर तक जाने वाले पापा को कार ही सेफ लगती है. मम्मी की लापरवाहियां भी कम होने लगती हैं, सोने जागने का एक सही वक़्त होने लगता है. अचानक से प्लानिंग में हमारा भरोसा बढ़ने लगता है. मम्मी-पापा को आदत होने लगती है कि उनके आसपास हमेशा जॉन्सन&जॉन्सन की खुशबू बिखरी रहे. वो भीनी-भीनी बेबी स्मैल अब ज़िन्दगी की ख़ुशबू बन जाती है. और तुम बेख़बर रहते हो इन सब बातों से, सिर्फ मुस्कुराते हुए. उस मुस्कराहट में हम दोनों तलाश लेते थे अपने अपने मन की बातें.

मुझे याद है एक बार जब मैंने तुम्हे समझाया था कि एक दिन सारे बच्चों के मम्मी-पापा को उन्हें छोड़कर जाना होता है, क्योंकि वो बूढ़े होते जाते हैं और बच्चे भी बड़े और समझदार होते जाते हैं. तब से तुम हमेशा यही कहते आये कि मुझे बड़ा नहीं होना मेरे बड़े होने से आपलोग बूढ़े हो जाओगे और फिर आपको यहाँ से कहीं चले जाना पड़ेगा. इस मासूमियत का भला कोई क्या जवाब दे सकता है.

प्यार और गुस्से के फ़र्क को समझने की तुम्हारी मासूमियत जब भी याद आती है तो एक बड़ी मुसकान फ़ैल जाती है होठों पर. कभी जब मैं एक हलकी सी चपत लगा देती तो पहले तुम पूछते थे कि आपने प्यार से मारा या गुस्से से. अगर मैं कह दूँ प्यार से तो मुस्कुरा कर वापस खेलने लग जाते थे और कह दूँ गुस्से से तो नाराज़ होकर रोना शुरू कर देते थे. तुम अब भी यही करते हो, मैं कुछ भी कहूँ तो मेरी आँखों में झाँककर ये खोजने की कोशिश करते हो, कि बात प्यार से कही है या गुस्से से. पर अब सीधे पूछते नहीं हो. कुछ और बड़े होकर तुम समझने लगोगे कि वो गुस्सा भी तो दरअसल प्यार ही है, ख़ालिस प्यार..


जिस दिन तुम आये थे, उस दिन से लेकर आज तक हर रोज़ तुम्हारा होना हमें ज़िन्दगी के नए एहसास से भर जाता है. इंतज़ार भी होता है कि तुम जल्दी से बड़े हो जाओ और तुम्हारे बड़े होने को लेकर एक अजीब सी असुरक्षा भी होती है.. कहीं ऐसा न हो कि तुम बड़े हो जाओ और फिर तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरी ज़रूरतों के बहाने धीरे धीरे कम होने लगें, क्या सारे माँ-पापा ऐसे ही होते हैं, हम जो चाहते हैं, उसे खुद ही काटते हैं और जिसे काटते हैं फिर खुद ही उसे जोड़ते भी हैं. ऐसा सीधा सीधा सोचना और उलटी उलटी उम्मीदें पालना तो हर तरह के प्यार का हिस्सा होता है. जैसे हमारे बीच प्यार का सबसे ख़ूबसूरत पहलू ये यह है कि कुदरत ने ही हमारा साथ और पास होना तय करके भेजा है. जब कभी भी गोल चक्कर लगाते हुए तुम बेसबब चूम लेते हो माँ को तो बस उस पल ही ज़िन्दगी मुक़म्मल हो जाती है. तुम्हारी कच्ची उम्र के कच्चे तजुर्बे सुनना, बदमाशियों में साथ देना, शिकवे दूर करने के लिए दिन दिन भर बाज़ारों में घूमना और नन्हें से दिल की अलग अलग सरगम से भीग जाना, अगर ये सब न हुआ होता तो सच में ज़िन्दगी बड़ी बेसलीका जाती.


तुम्हारी हर सालगिरह पर मेरा मन वही अटक जाता है, जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था, मेरी अधखुली आँखों को तुम्हारी पूरी खुली आँखें ख़ूब निहार रहीं थीं. बेसाख्ता मेरे मुंह से निकल गयी थी ये बात कि ‘मम्मी इसके सर पर बाल ऐसे हैं जैसे बड़े बच्चों के होते हैं’ और फट मुझे डांट लगायी गयी थी कि तुम तो बच्चे को नज़र लगा दोगी. अब सोचती हूँ तो बेहद अजीब लगता था कि कुछ समय ऐसा भी था जब हमारे पास तुम्हें पुकारने के लिए कोई नाम न था. मुझे नहीं पता था कि तुम्हें किस नाम से पुकारूं. उस वक़्त तुम्हें कहाँ पता था कि ‘माँ’ क्या होती है, ठीक ठीक कहूँ तो मुझे भी नहीं पता था कि माँ होना क्या होता है. मैं अब भी हर रोज़ सीख रही हूँ तुमसे कुछ कुछ, ये लाग बात है कि ये सीखना, सिखाने के अभिनय तले होता है. 

मेरे पास-पास रहना, साथ-साथ रहना, नकली दांतों के इस्तेमाल से पहले, अभी बहुत कुछ सीखना है.. Happy Birthday Darling!! 



लम्बी उम्र, अच्छी सेहत, ढेर सारा प्यार, खूब सारी तरक्की जैसी सारी क्लीशे ब्लेसिंग्स :) 

लव लव लव.. मम्मा (मम्मा का ये यक़ीन है कि प्यार तीन बार कहने से ही मुक़म्मल होता है) 

Nov 6, 2014

एक नज़्म: टूटी हुई चीज़ों के नाम





घर में यूँ टूट जाती हैं कुछ चीज़ें
जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दे दिया हो धक्का,
जो जानबूझ कर तोड़ता हो चीज़ें.
ये अदृश्य हाथ न मेरा है न तुम्हारा
ये उन सख्त नाखूनों वाली लड़कियों में से भी कोई नहीं है
और न ही धरती की गति से टूटी हैं ये चीज़ें
ये सब किसी व्यक्ति या वस्तु से नहीं हुआ है
नारंगी दोपहरों का भी इनमें कोई हाथ नहीं
न ही पृथ्वी पर पसरी रात का
न ये चीज़ें हमारी नाक से टकराई हैं
न हमारी कोहनी से
न ही देह के फैलाते हुए पिछले हिस्से या टखने से
न ही हवा ने इन्हें गिराया है.
टूट गयी तश्तरी, गिर गया लैम्प
एक एक कर के लुढ़क गए सारे फूलदान.
वह गुलदान जो अक्तूबर के शबाब में
लहलहाता था गहरे लाल रंग से भरा
ऊब गया वह उन बैंगनी रंगों से
और दूसरा खाली गुलदान भी गोल गोल लुढ़कता है सारी सर्दियों भर
तब तक जारी रहा उसका यह घूर्णन
जब तक शेष रहा उसका अस्तित्व
अंत में रह गया सिर्फ गुलदान का कुछ चूरा,
एक खंडित स्मृति, चमचमाती गर्द.

और वह घड़ी जिसकी टिक टिक
पर चलती थी ज़िन्दगी
जिससे बंधा था हमारे गुज़िश्ता वक़्त का राज़
जिसने एक एक कर दिए थे हमें वे अनगिन घंटे
शहद की मिठास में लिपटे और कभी बिलकुल चुप
जिनके दौरान हम करते थे कितने काम
और दुनिया होते रहते कितने जन्म
गिर गयी वो घड़ी भी
और कांच के टुकड़ों के बीच
सिसकती रहीं उसकी नाज़ुक नीली सूइयां
छिटक कर बाहर गिर पड़ा उसका दिल

ज़िन्दगी चलती रहती है कांच का चूरा बनाते हुए,
जुटते जाते हैं बोशीदा कपड़ों के ढेर
और ज़िन्दगी के अरूप लम्हे
समय के इस चक्र में जो बचा रह जाता है
वह समुद्र में तैरते किसी जहाज पर बने एक द्वीप सा है
बनावटी और नश्वर
और घिरा हुआ है, क्रूर, तूफ़ान की धमकियों और
बेसाख्ता टूटने के खतरों से

चलो हम जोड़ लें अपने सारे खजाने एक थैले में—
वे घड़ियाँ, तश्तरियां, ठण्ड की जकड़न से चटके प्याले
और उन्हें बहा आयें चट्टानों से टकराती
और नदी सी विशाल किसी खौफनाक समुद्र की लहर में
आओ दुआ करें कि समुद्र की मेहनतकश लहरें
जोड़ दे हमारे टूटे हुए असबाब.
कितनी गैर ज़रूरी चीज़ें
जिन्हें नहीं तोड़ा किसीने
लेकिन जो टूट गयीं बेसाख्ता  

* * *