जो सच नहीं हो सका, जो मुमकिन नहीं हो सका, वो ही ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत पल रहा होता, ऐसा सोचना और उसे न जीते हुए भी हर रोज़ जीना लगभग यही तौर है हमसब की ज़िन्दगी का. जैसे यूँ कहना कि फलां बात या फलां शख्स को तो हम भूल गए, पर भूलने के लिए कितनी बार याद किया होगा, इसका कोई हिसाब नहीं.
सारे अफ़सोस जुटाना रोज़ और उन पर फिर फिर करना अफ़सोस, ये बेगैरत सी हरकत लगभग वैसी ही ज़रूरी है, जैसे सुबह आँख खुलने को एक प्याली चाय.
हर रोज़ हौसलों को यकजा करना, हर शाम खुद को बिखरा हुआ पाना, जो न हो
ये सब तो किस कारोबार में गुज़रेंगे ये लम्बे दिन. असल बात तो ये है कि बहुत सारी
पीड़ाओं और दिलशिकनी के किस्सों के बावजूद भी जब हम सुबह उठते हैं तो हमारे पहलू
में एक उम्मीद मुस्कुराती मिलती है कि आज का दिन तुम्हारा है, जीत लो इसे! जैसे
रॉबिन विलियम्स ने ‘डेड पोएट्स सोसाइटी’ में कहा था Carpe Diem!! (Seize the Day!)
सुबह का रंग कभी फ़ीका नहीं पड़ता, उसके रंगों से फूटती किरणें ही तो तय
करती हैं हमारे दिन का रोड-मैप. खिड़की पर उतरता सूरज, ठंडी हवा का लम्स, गमलों में
उगा हरापन.. गोरा निखरा आसमान इन सारी नेमतों के हक़दार हम क्यों हुए भला. दरअसल,
जो अबूझ है, उसमें ही ज़िन्दगी और सुकून के कतरे हैं. धूप और पानी के रंगों को न
जानना कितना सुकूनपरस्त है, कुछ तो बचा है जो सिर्फ महसूस करने की चीज़ है, जिस दिन
इनके रंगों के लिए नाम तलाश लिए हमने, उस दिन ही शुरू हो जाएगा नकली धूप का
कारोबार.
