Nov 28, 2014

एक पागल औरत की चिट्ठी



(1).



मेरे आक़ा
ये एक पागल औरत की ओर से लिखी गयी चिट्ठी है
क्या मुझसे पहले भी किसी पागल औरत ने आपको ख़त लिखा है?
मेरा नाम? छोड़िये, नामों को किनारे करते हैं
रनिया या ज़ैनब
या हिन्द या हायफ़ा
मेरे आक़ा, जो सबसे बेहूदा चीज़ हम अपने साथ लिए फिरते हैं- 
वो ये नाम ही तो हैं


(2).


मेरे आका,
मैं खौफ़ खाती हूँ अपने मन की बात आपसे कहने में
मुझे खौफ़ है कि - गर मैंने कहा तो - आग लग जाएगी जन्नतों में 
क्योंकि मेरे आका, पूरब के इस हिस्से में 
ज़ब्त कर ली जाती हैं नीली चिट्ठियाँ
ज़ब्त कर लिए जाते हैं सपने औरतों के सीने में संजोये 
कुचल दिया जाता है यहाँ औरतों के जज़्बात को 
यहाँ चाकुओं और छुरों 
की ज़बान में बात की जाती है 
औरतों से 
यहाँ क़त्ल कर दिया जाता है 
वसंत का, प्रेम का और काली गुँथी चोटियों का 
और पूरब के इस हिस्से में मेरे आका 
उन्हीं औरतों के सर की हड्डियों से 
बनाया जाता है पूरब का हसीन ताज़ 



(3).



मेरे आक़ा
मेरी खराब लिखावट देखकर नाराज़ न हों
क्योंकि इधर मैं आपको ये ख़त लिख रही हूँ
और उधर मेरे दरवाज़े के पीछे लटक रही है श्मशीर
इस कमरे के बाहर हवा की सरसराहट और कुत्तों की आवाजों की गूँज है
मेरे आक़ा!
अंतर् अल अब्स मेरे दरवाज़े के पीछे खड़ा है!
गर उसने ये ख़त देख लिया तो
कसाई की मानिंद वह मेरे टुकड़े कर डालेगा
वो मेरा सर क़लम कर देगा
गर मैंने अपनी यातनाओं के बारे में कुछ कहा तो
गर उसने देख लिए मेरे झीने कपड़े
तो धड़ से अलग कर देगा वो मेरा सर
क्योंकि मेरे आक़ा, पूरब के इस हिस्से में,
औरतें घिरी रहती हैं भालों की नोंक से
और मेरे आक़ा, तुम्हारा पूरब 
मर्दों को तो पैगम्बर बना देता है
और औरतों को दफ़ना देता है धूल में


(4).



नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
इन सफ़ों को पढ़कर
नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
अगर सदियों से बंद शिकायतों को मैं तहस-नहस कर दूँ 
गर मैं बाहर आ जाऊं अपनी बेहोशी से
गर मैं भाग जाऊं...
किले के हरम में बने गुम्बदों से
गर मैं बग़ावत कर दूँ अपनी मौत के ख़िलाफ़...
अपनी कब्र, अपनी जड़ों के ख़िलाफ़...
और उस विकराल कसाईखाने के ख़िलाफ़...

नाराज़ न होइएगा मेरे आक़ा!
अगर मैं आपसे कह देती हूँ अपने दिल की बातें
क्योंकि पूरब में बसने वाले आदमी
का कोई सरोकार नहीं नज़्म और जज़्बात से
गुस्ताख़ी माफ़ मेरा आक़ा- पूरब का आदमी-
कुछ नहीं समझता औरत को
बिस्तर से परे


(5).



मुझे माफ़ करिए मेरे आक़ा! 
गर मैंने मर्दों  के साम्राज्य पर हमले की गुस्ताख़ी की है
क्योंकि पूरब का महान अदब
वास्तव में सिर्फ मर्दों का अदब है
और यहाँ प्रेम हमेशा से
मर्दों के हिस्से में ही आया है
यहाँ कामवासना एक दवा की तरह
सिर्फ मर्दों को ही बेची जाती हैं

हमारे देश में औरतों की आज़ादी का ख़याल
एक बेवकूफ़ाना परीकथा जैसा है
क्योंकि इस देश में
मर्दों की आज़ादी से इतर
कोई आज़ादी नहीं होती

मेरे आक़ा
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता, जो भी आपके जी में आये, आप कह लें मुझे:
कि मैं ओछी हूँ.. पागल हूँ.. सनकी हूँ.. कम अक्ल हूँ..
मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगेगा..
क्योंकि जो भी औरत लिखती है अपने सरोकारों की बात
उसे मर्दों का तर्क
पागल औरत ही मानता है
और क्या मैंने शुरुआत में ही आपसे नहीं कह दिया 
कि मैं एक पागल औरत हूँ?