हर दिन हम खर्च करते हैं ज़िन्दगी को ज़रा-ज़रा और इस
तरह गुज़रते जाते हैं माह-ओ-साल. यही तो वक़्त की खूबी है और ख़ामी भी कि वो गुज़र जाता
है और छोड़ जाता है यादों के ढेर सारे ‘पार्टिंग गिफ्ट’. कितने पार्टिंग गिफ्ट्स
देता है ना ये वक़्त, इतने सारे कि लगता है जो जिया था वो अभी छूटा ही नहीं है, उन
गिफ्ट्स के अन्दर से झांकते रहते हैं पुराने जिये हुए पल. सारे दिन ताज़ा वक़्त की गिरफ़्त
में होते हैं हम और पिछला वक़्त थामे रहता है हमारे हाथ की नन्हीं वाली अंगुली, एक
छुअन भर की दूरी पर चलता रहता है साथ. हर वक़्त दो रंगों में जीते हैं हम, एक
पिछ्ला.. थोड़ा ज़र्द, और एक रंग आज का जिसके अन्दर क़ैद होते हुए उसकी रंगत का ठीक
ठीक अंदाजा नहीं हो पाता हमें. पूरी शिद्दत से आज को जीते हुए भी, पीछे मुड़ने का
सम्मोहन हम कभी नहीं छोड़ पाते. पुराने लम्हों को एक निग़ाह भर देखना वैसा ही एहसास
है जैसे पुरानी, छिपा कर रखी गयी चिट्ठियों को खोलना, कभी इस उम्मीद में कि सुख
आएगा उन प्यारी बातों को पढ़कर और कभी कुछ इस तरह कि हम जानबूझ कर उधेड़ते जाएँ
ज़ख्मों की सीवन.
वैसे तो ये क्या बात हुई कि आज नवंबर की पहली
तारीख़ को बीते एक साल का मुआयना किया जाए. अमूमन ये सब जनवरी में किया जाता है, पर
फिर भी मैं ऐसा करूँ तो सिर्फ एक छोटा सा ही ख़तरा उठा रही हूँ, कि लोग मुझे पागल
कह लें, एक तरह से ये बड़ी ख़ूबसूरत बात है, पागल हो जाना, क्योंकि पागल हो जाने का
एक अर्थ है, दूसरों से बेपरवाह, अपनी धुन में, अपनी मौज में जीते जाना. एकबार सोचो
तो कि वो ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत होगी जो हम औरों के नज़रिए से बेपरवाह अपनी धुन में
जियेंगे, पूरी ज़िन्दगी न सही पर हर महीने में से कुछ ऐसे दिन तो मैं चुरा ही लेती
हूँ और उन दिनों अपनी, धुन, अपनी मौज में औरों से बेपरवाह होकर जीती हूँ. खैर..बात
निकलती है तो दूर तक जाती है, और बातों का क्या है, शुरू कहाँ से हो और ख़त्म कहाँ
पर कुछ तय नहीं, जैसे प्रेम.. शुरू होता है, और अक्सर ख़त्म भी, पर ख़त्म कहाँ पर हो
इसका क्या भरोसा, अक्सर नफ़रत की गर्त में जाकर या कभी उदासीनता के कुएं में गिरकर ख़ुदकुशी
भी कर लेता है. फिर भी लोग कहते हैं अधूरी प्रेम कथाएं महान होती हैं. शायद उन्हें
यूँ कहना चाहिए कि वे कहानियां महान होती हैं जहाँ प्रेम ख़ुदकुशी नहीं करता..
सोचते जाने का भी कोई हिसाब नहीं, इसलिए मैंने खुद को फिर से वक़्त की
तरफ मोड़ लिया है. अलग अलग कैफ़ियत वाले खूब सारे दिनों का सिलसिला आज फिर किसी
गुलदस्ते में सजकर सामने आ गया है. बीते साल इसी दिन मैं देहरादून से लौटकर कानपुर
आई थी. लौटकर.. क्योंकि कानपुर अपना ही शहर है. लौटकर आना सुखद होता है, पर ये सुख
कायम ही रहे ये ज़रूरी भी नहीं और मुमकिन भी नहीं. आदतन हम कुछ भी करने से पहले
बहुत सारी आशाएं, अपेक्षाएं रखने लगते हैं वक़्त से, वक़्त पूरी भी करता है. हम गलत
वहां हो जाते हैं जब हम अपनी और वक़्त की हैसियत से बढ़कर उम्मीदें पालने लगते हैं.
ऐसा कब होता है कि ज़िन्दगी ‘बेड ऑफ़ रोज़ेज’ की तर्ज पर मिले आपको. क्या अच्छा था
क्या बुरा इसका फैसला यूँ ही नहीं होता, इसके लिए दोनों परिस्थितियों से गुज़रना
होता है, उन्हें जीते हुए अपने अस्तित्व को उनके हवाले करना होता है. कानपुर आना
अच्छा भी रहा और बुरा भी, बुरा इस तरह कि पिछले साल ही वह हादसा पहली बार ज़िन्दगी
में आया कि दो महीने बिस्तर पर सीधे लेटे हुए गुज़ारने पड़े. इतनी ही तकलीफ़ क्या कम
थी, जो उसके साथ हर रोज़ सामने वाले बिस्तर पर अपने बेटे को लेटे हुए भी देखना पड़ता
था. हमेशा उछल कूद करने वाला बच्चा, दो महीने तक ज़मीन पर अपने पाँव रखने से भी
लाचार रहा. कभी मैं लेटे हुए सोचती थी काश मैं ठीक होती तो अपने बच्चे की देखभाल
कर सकती थी, फिर सोचती कि काश ऐसा हुआ होता कि चोट सिर्फ मुझे आई होती, बेटे को
कुछ न हुआ होता, कभी सोचती कि शुक्र है कुछ हड्डियाँ भर टूटीं और हम बच गए.. और इसी तरह न जाने क्या क्या सोचती. पर परिवार और दोस्तों के साथ
से वो मुश्किल वक़्त भी गुज़र गया. गुज़र तो यूँ भी जाता, पर आज कुछ लोगों को
शुक्रिया कहने का मन हो आया जो उन दिनों खूब साथ और खूब पास थे. दोस्त उन दिनों
खूब फोन करते थे, एक दोस्त था, जो कहता था कि मैंने यहाँ से कुछ दुआएं फूंकी हैं,
अभी तुम्हारे दर्द में आराम आएगा और राघव की तकलीफ भी कम होगी. कुछ दोस्त सुबह शाम
फोन पर या Whatsapp पर जोक्स सुनाते थे. इन सबके बावजूद मेरे दिमाग़ की सूई इसी
बात पर अटकी रहती थी कि अगर मैं कानपुर न आई होती तो शायद ये हादसा न हुआ होता,
ज़िन्दगी यूँ बेक़ायदा न बीत रही होती. कभी कभी किसी उधेड़बन में पड़ जाना ही बेहतर होता
है बहुत सारी ख़राब हक़ीक़त जानने से अच्छा तो यही है कि हम उलझन में पड़े रहें... निर्णय
न कर पायें, कम से कम उम्मीद तो रहती है कि जो बातें हैं वे शायद झूठ की फ़सीलें
हों कि जो ख़याल मन में आ रहे हैं वो शायद बेबुनियाद हों.
इतने दिन बीते पर एक भी दिन ऐसा न बीता जब देहरादून को याद न किया हो,
जब मसूरी की पहाड़ियों की तस्वीर सुबह मेरी आँखों में न आई हो. उस बालकनी का
तसव्वुर भी एक खुशी और ताज़गी से भर देता है, जहाँ हाथ में चाय का प्याला थामे, मैं
न जाने कितनी कितनी देर तक पहाड़ों को देखती रहती थी, अगला बगल से बेख़बर, किसी तवील
इंतज़ार में डूबे पहाड़ जो धुंध वाले दिनों में उदास और धूप वाले दिनों में यौवन से
भरे लगते थे. जिस दिन वो मौसम की चाल का शिकार हो जाते तो मैं उन्हें देख न पाती, और
उस दिन चाय का कोई भी प्याला मुकम्मल न हो पाता. बेजान चीज़ों से भी कैसा रिश्ता
जोड़ लेते हैं हम, फिर मैंने तो ये रिश्ता उस शै से जोड़ लिया था जिसे मैं न तो साथ ला
सकती थी, न उसके जैसे किसी और को तलाश कर सकती थी. यादों के साए ऐसे ही होते हैं,
किसी प्रेतबाधा की तरह कि अब भी जब किसी खिड़की से बाहर झांकती हूँ तो जी चाहता है
कि वो ही पहाड़ दिख जाएँ मुझे, और हम आपस में बाँट लें कुछ अकेलापन.
इस तरह सब मिलाकर बीते साल ने ज़िन्दगी के मुश्किल सबक दिए, याद रखने
को. लोगों और आदतों को ज़िन्दगी में शामिल भी किया तो बेदखल भी. पर ये पार्टिंग
गिफ्ट, कभी न भुला सकने वाला गिफ्ट रहा..
Eternal and Unforgettable!!
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