Oct 13, 2014

मैं बे-हुनर ही सही.. मेरी कुछ ज़रूरत तो थी


हर रंग एक दिन ज़र्द पड़ जाता है. बचा वही रह जाता है जो हम उस रंग से चुराकर अलग रख लेते हैं, कहीं टांक लेते हैं स्मृतियों में, कहीं संजो लेते हैं तहों के भीतर, धूप-छाँव से दूर अपने ही अस्तित्व के आलोक में वे रंग ज़िंदा दिनों के लिए ज़रूरी असबाब होते हैं.

ऐसी छोटी छोटी बहुत सी चीज़ें इकट्ठा करते हुए बीता है अब तक सफ़र, कहने को तो बसर और गुज़र ही हो रही थी .. पर इस खजाने में सामां बढ़ता ही गया. कि अब ज़रूरत लगने लगी तहों में बसे उन रंगों को नए सिरे से सँभालने की, तरतीब में रखने की. एकबार फिर से उनके आलोक में खुद को देखने की.

इतनी मुद्दत बाद जब इस तरह से सोचा और कदम बरबस पीछे की ओर जाने लगे तो पाया कि ऐसी कितनी ज़रूरी चीज़ें हैं, ख़याल हैं, सांस लेते टुकड़े हैं जिन्हें तरतीब में लगाना ज़रूरी है, उनकी धडकनों को गिनना ज़रूरी है अपनी धड़कन की रफ़्तार से उनकी धड़कन को मिलाना ज़रूरी है. खूब सारे रंग बिरंगे टुकड़े देखकर एकबार को यक़ीन न हुआ कि ये सामान अपना ही है. ये सबकुछ अपना जिया और सोचा है. ऐसे बहते हुए अचानक एक ही लफ्ज़ आया मन में ‘कतरन’ कि ये सब मेरी ज़िन्दगी की कतरनें ही तो हैं. कितने सुकून भरे पल इन्हें दिए हैं, कभी इनके तसव्वुर में कितने बेचैन दिन काटे हैं, कितनी ख़ूबसूरत यादें टांकी हैं इनपर.

तो बस जिन्हें संजोती आयी, वो तो हैं ही और आगे भी ऐसी कतरनों को ज़ाया नहीं होने देना है.

‘कतरन’ के नाम से अब बचा कर रखूंगी सारे रंग

कतरन पर आपको मिलेंगे ज़िन्दगी को लिखे गए कुछ ख़त ('ऑलमोस्ट बकबक'), कुछ मेरी पसंद की अंग्रेज़ी कविताओं का तर्जुमा, कुछ ख़ालिस कविता जैसी चीज़ भी मिल सकती है, और मिलेगा ढेर सारा पागलपन, बेबात की बातें और न जाने क्या क्या हो, जिससे अभी ख़ुद मैं भी अनजान ही हूँ.
  
अपने बारे में कुछ कहना सदा ही असहज रहा है, जैसे खुद को पहचानना भी अक्सर असहज करता आया है मुझे. पर अब तक खुद में जो भी पाया है उससे सुकून में हूँ. छोटे और पुराने शहरों की आदत है, कि जहाँ हाथ बढ़ाओ तो किसी दोस्त से ही टकराये. मेरी एक दुनिया है और उसके अन्दर न जाने कितनी और दुनियाँ हैं, उदासियों की, खुशियों की, ख़्वाबों की, बरबादियों की.. हर दुनिया में बहुत सारी मैं हूँ और बाकी सबकुछ की तरह ये भी तो अनिश्चित ही है कि वे मुझमें हैं या मैं उनमें हूँ. पर ख़ास बात उनका होना है. उनके होने से मैं हूँ, मेरे होने से ये जगह वज़ूद में आई है. शायद इस जगह पर सबकुछ साथ साथ मिल सकेगा और साथ होते हुए भी किसी का रंग न खोएगा, न ज़र्द होगा..  


[ब्लॉग के हेडर की तस्वीर के लिए कुंवर रवीन्द्र भाई का शुक्रिया और उसे मेरे माफिक रंग-रूप और आकार देने के लिए प्रिय निशिथ का]