हर रंग एक दिन ज़र्द पड़ जाता है. बचा वही रह जाता है जो हम उस रंग से
चुराकर अलग रख लेते हैं, कहीं टांक लेते हैं स्मृतियों में, कहीं संजो लेते हैं
तहों के भीतर, धूप-छाँव से दूर अपने ही अस्तित्व के आलोक में वे रंग ज़िंदा दिनों
के लिए ज़रूरी असबाब होते हैं.
ऐसी छोटी छोटी बहुत सी चीज़ें इकट्ठा करते हुए बीता है अब तक सफ़र, कहने
को तो बसर और गुज़र ही हो रही थी .. पर इस खजाने में सामां बढ़ता ही गया. कि अब
ज़रूरत लगने लगी तहों में बसे उन रंगों को नए सिरे से सँभालने की, तरतीब में रखने
की. एकबार फिर से उनके आलोक में खुद को देखने की.
इतनी मुद्दत बाद जब इस तरह से सोचा और कदम बरबस पीछे की ओर जाने लगे
तो पाया कि ऐसी कितनी ज़रूरी चीज़ें हैं, ख़याल हैं, सांस लेते टुकड़े हैं जिन्हें
तरतीब में लगाना ज़रूरी है, उनकी धडकनों को गिनना ज़रूरी है अपनी धड़कन की रफ़्तार से
उनकी धड़कन को मिलाना ज़रूरी है. खूब सारे रंग बिरंगे टुकड़े देखकर एकबार को यक़ीन न
हुआ कि ये सामान अपना ही है. ये सबकुछ अपना जिया और सोचा है. ऐसे बहते हुए अचानक
एक ही लफ्ज़ आया मन में ‘कतरन’ कि ये सब मेरी ज़िन्दगी की कतरनें ही तो हैं. कितने
सुकून भरे पल इन्हें दिए हैं, कभी इनके तसव्वुर में कितने बेचैन दिन काटे हैं,
कितनी ख़ूबसूरत यादें टांकी हैं इनपर.
तो बस जिन्हें संजोती आयी, वो तो हैं ही और आगे भी ऐसी कतरनों को ज़ाया
नहीं होने देना है.
‘कतरन’ के नाम से अब बचा कर रखूंगी सारे रंग
कतरन पर आपको मिलेंगे ज़िन्दगी को लिखे गए कुछ ख़त
('ऑलमोस्ट बकबक'), कुछ मेरी पसंद की अंग्रेज़ी कविताओं का
तर्जुमा, कुछ ख़ालिस कविता जैसी चीज़ भी मिल सकती है, और मिलेगा ढेर
सारा पागलपन, बेबात की बातें और न जाने क्या क्या हो, जिससे अभी ख़ुद मैं भी अनजान
ही हूँ.
अपने बारे में कुछ कहना सदा ही असहज रहा है, जैसे खुद को पहचानना भी अक्सर
असहज करता आया है मुझे. पर अब तक खुद में जो भी पाया है उससे सुकून में हूँ. छोटे
और पुराने शहरों की आदत है, कि जहाँ हाथ बढ़ाओ तो किसी दोस्त से ही टकराये. मेरी एक
दुनिया है और उसके अन्दर न जाने कितनी और दुनियाँ हैं, उदासियों की, खुशियों की,
ख़्वाबों की, बरबादियों की.. हर दुनिया में बहुत सारी मैं हूँ और बाकी सबकुछ की तरह
ये भी तो अनिश्चित ही है कि वे मुझमें हैं या मैं उनमें हूँ. पर ख़ास बात उनका होना
है. उनके होने से मैं हूँ, मेरे होने से ये जगह वज़ूद में आई है. शायद इस जगह पर
सबकुछ साथ साथ मिल सकेगा और साथ होते हुए भी किसी का रंग न खोएगा, न ज़र्द होगा..
[ब्लॉग के हेडर की तस्वीर के लिए कुंवर रवीन्द्र भाई का शुक्रिया और उसे मेरे माफिक रंग-रूप और आकार देने के लिए प्रिय निशिथ का]

Beautiful! keep it up! You truly needed it!
ReplyDeleteबस ज्यादा संजीदा मत होना, और ज्यादा लापरवाह भी मत होना इसको ले के। :)
Prateek.... How could it happen? I never knew that you are here. Thankss so much. Will keep it in mind :)
Deleteनयी शुरूआत के लिए बधाई ..
ReplyDeleteआपको यह करना ही चाहिए था .. रंग बचाने जरूरी हैं ..
मैं सच कह रहा हूं .. आपसे इर्ष्या हो रही है .. सोचता हूं ईश्वर ने हमें भी इतनी शिद्दत से महसूस करने वाला क्यों न बनाया .. हम जैसे लोग सोचते हैं, समझते हैं, सोच- समझकर जिंदगी को नियंत्रित भी कर रखते हैं .. पर 'रंग' या तो बचता नहीं या उसे पहचान नहीं पाते, उसे उतना गहरे उतार नहीं पाते ..
आपको पढ़ना, एक जगह आकर अबतक लिखा सब मिल जाने का आश्वासन अच्छा रहेगा ..
बधाई, फिर- से ..
राकेश जी: कोशिश भर है, आगे न जाने क्या होगा. अपनी ही अपेक्षाओं पर खरा उतर पाना भी कभी कभी बहुत मुश्किल हो जाता है :) आपको सारे रंग मिलेंगे यहाँ, खूब स्वागत है.
Deleteअच्छा है. कोई एक कोना हो जो पूरी तरह सिर्फ अपना हो. वर्ड वेरिफिकेशन की बाध्यता हटा दीजिये तो और अच्छा होगा
ReplyDeleteविमल: हाँ.. यहाँ हमेशा एकांत मिल जाएगा. हटा दिया वर्ड वेरिफिकेशन. अभी सीखने के दिन हैं :)
Deleteहुनरमंदो और उनकी ज़रदोज़ हुनरमंदियों से ये दुनियां पटी पडी है अब दुनियां को कुछ तुम्हारे जैसे बे-हुनर लोगो की ख्वाहिश है ...
ReplyDeleteहेमा दी: बेहुनर, बेपरवाह, बेकार, बेकस, बेहिस.. और भी कई विशेषण हैं :)
Deleteआगज़ अच्छा है तो अंजाम भी खुदा नहीं तुम ही जानोगी, सम्हालोगी. मैं मानता हूँ कि अंजाम भी भला ही होगा. स्वागत और बधाई तुम्हारे इस ब्लॉग के लिए. स्वागत है ब्लॉग की दुनिया में.
ReplyDeleteथैंक यू बसंत सर :)
Deleteफेसबुक एक सोशल डिस्प्ले मंच है तो ब्लॉग अपने मन की कतरनों का दस्तावेजीकरण। आपकी रचनात्मकता का फलक व्यापक है उसमें रोजमर्रा की जिन्दगी को एक सम्वेदनशील चश्में से देखने का अदब और इल्म दोनों शामिल है। आपके अनुवाद और आलमोस्ट बकबक दोनों ही जिन्दगी के उन रास्तों का पता देतें है जहां जाकर हम खुद से गहरी मुलाकातें कर सकते है। 'कतरन' वो बरगद बनेगा जहां हम हद दर्जे की सामाजिकता से उकताएं चंद लम्हें अपने मन की सुनते हुए सुस्ता सकें। सलाह देने में मेरे अपने संकोच शामिल रहते है खासकर जहीन लोगों को फिर भी आपने जिस भी अभिप्रेरणा से यह ब्लॉग बनाया है वह भी निसंदेह काबिल ए तारीफ़ है।
ReplyDeleteकतरन खुद से गुफ़्तगू का अड्डा बनें साथ ही इन कतरनों से हम अपने सुख-दुःख की तुरपाई कर सकें मेरी यही कामना है।
इस पुरानी मंजिल के नए सफर के लिए मेरी अशेष शुभकामनाएं..
डॉ.अजीत
अजीत जी, आप बगैर किसी संकोच के सलाह दें. यक़ीन जानिये मुझे फायदा ही होगा आपकी सलाह से. शुभकामनाओं की बहुत ज़रूरत है.
Deleteआपके विश्लेषण के तो बहुत लोग कायल हैं, हमें अपने किये के प्रति भी एक नई इनसाइट मिलती है आपके तटस्थ विश्लेषण से. उसको हमेशा जारी रखें.
थोड़ी देर करी लेकिन वो क्या कहतें हैं की साबरा का फल मीठा होता है .... काफी कुछ मिलेगा पढ़ने को ! समझने को ! सीखने को !!! मैं तो कहूँगा की Blog शुरू करने के लिए Thank You!!!
ReplyDeleteThanks to you too Deep. I will try my best to update this blog regularly :)
Deleteबहुत बधाई और शुभकामनाएँ।
ReplyDeleteशुक्रिया सर !
DeleteReading you is always a pleasue,और सब एक जगह..simply wow..please keep writing :)
ReplyDeleteThanks Suchhit!!
DeleteDoston ka hausla hi ye sab karva sakta tha mujhse :)
मुझे ख़ुशी हुयी
ReplyDeleteThank you Sanjay ji :)
Deleteआपको पढना हमेशा सुखद होता है
ReplyDeleteबधाई एवं शुभकामनायें :)
शुक्रिया मनीष जी, अब ये एक खिड़की भी खुली रहा करेगी :)
Deleteशानदार आगाज ............बहुत शुभकामनायें
ReplyDeleteथैंक यू दीदी :)
Deleteशुभकामनायें...
ReplyDeleteशुक्रिया सुमन मैम :)
Deleteआपने इधर का रुख किया ये बड़ा अच्छा लगा हमें
Deleteआह जाते दिनों में कोई आया है.
ReplyDeleteऔर साग़र साहब क्या चल रहा है ?
Deleteशुक्रिया सागर!
Deleteजाने वालों से कहिये कि न जाएँ
नए दोस्तों के मिलने का कोई वक़्त नहीं होता.. :)
:-) Loved it through and through Bhavna
ReplyDeleteThanks Darpan!
Deleteमैं सोच ही रही थी दर्पण क्यों नहीं दिखा मुझे अबतक.. पुराना ब्लॉगिया ;)
And I am ordering you to keep visiting here..
चकाचक शुरुआत !
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