जो बीत गया अभी अभी वो दोबारा न आएगा कभी और आया तो ठीक वैसा न रहेगा जैसा अभी गुज़रा था. इस तरह
सोचती हूँ तो लगता है कि हम कितना कुछ खोते हुए भी ज़िन्दगी में आगे बढ़ते जा रहे
हैं बाखुशी.
रुकना और बढ़ जाना भी कैसी बातें हैं, किसी स्मृति से छिटके हुए पल में जब दोबारा जाती हूँ तो लगता है कि जीवन वहीँ तो ठिठका था बरसों से... ये आना जाना अनवरत है और इनके बीच भी जीवन तमाम नए किस्से पिरोता रहता है अपनी तस्बीह में.
कई दिनों से मन कहता है कि जीने के लिए थोड़ा सा पागल हो जाना बेहतर है क्योंकी ऐसा न होने से पूरे पागल हो जाने का ख़तरा बना ही रहता है।
ज़िन्दगी कई सारे छोटे छोटे अफ़सोस से सजा एक गुलदस्ता है, जैसे मेरा एक ताज़ा अफ़सोस कि आज शाम गाड़ी में बैठे जब मैं अपने शहर के सबसे ख़ास चौराहे से गुज़री तो उसकी वो तस्वीर कहीं अटक गयी ज़ेहन में और दिल में टीस है कि अब उसको कभी मैं ठीक वैसा ही न देख पाउंगी जैसा वो आज शाम था। शायद अगली बार जब देखूं तो आसमान का रंग कुछ मद्धम हो या कुछ गहरा ही हो जाए. शायद किनारे वाला बरगद का हरा साया तब इस तरह पसरा न मिले सड़क पर, शायद बन्दर वाला मदारी अगली बार न खड़ा हो वहां, और न जाने क्या क्या डर... कितने अफ़सोस
जिसको सुबह वाली गाड़ी पकड़नी हो उसकी नींद यूँ ही हवा सी बहने लगती है
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क्या बहुत गहरी होती है वो नींद जो माँ का आँचल हाथ
में थामे सो जाने पर आती है
क्या बहुत मीठी, सुकून भरी होती होगी, वो रेशमी आँचल से उठकर बच्चे की शरारती आँखों में उतरती नींद
हो न हो, वो रात खिड़की से बाहर गिरा देती होगी
पिछले दिन की सारी थकन, सारे अफ़सोस..
पर क्या जाने क्या है वो नींद?? 24 साल पीछे जाकर सोचना होगा कि छः बरस का बच्चा क्यों हर रात पूरे जोर से थामे रहता है किसी दुपट्टे की कोर?
भोले शैतान की आँखों में दफ़अतन उतर आई उस नींद का असर दो रूहों पर आता है
कि जो सुकून उसको मिलता है उससे कहीं बढ़कर एक तिलिस्मी राहत होती है माँ को भी.
कि उसकी ज़रूरत के बहाने कभी ख़त्म न होंगे
उस लमहे गर ख़ुदा भी भेज दे जन्नत का बुलावा
तो नाफ़रमानी तय होगी
माँ भी सोचती है कि एक रात ऐसी आये जो अपने साथ ले चली जाए इतने सालों की थकन, जमा किये सारे अफ़सोस, चुन ले जाए जो तनहाई के बिखरे टुकड़े, सोख ले नमी को छिपा कर रखे गए रुमालों से.. जो बस खाली कर दे भरे जी को, और सुबह की हथेली पर रख जाए खूब सारा सुकून... सो माँ ने सोते वक़्त अपने हाथ में भर ली है नन्हे शैतान की सुर्ख हथेली
कानों में पड़ती है हमराह की आवाज़.. 'आमीन'!
क्या बहुत मीठी, सुकून भरी होती होगी, वो रेशमी आँचल से उठकर बच्चे की शरारती आँखों में उतरती नींद
हो न हो, वो रात खिड़की से बाहर गिरा देती होगी
पिछले दिन की सारी थकन, सारे अफ़सोस..
पर क्या जाने क्या है वो नींद?? 24 साल पीछे जाकर सोचना होगा कि छः बरस का बच्चा क्यों हर रात पूरे जोर से थामे रहता है किसी दुपट्टे की कोर?
भोले शैतान की आँखों में दफ़अतन उतर आई उस नींद का असर दो रूहों पर आता है
कि जो सुकून उसको मिलता है उससे कहीं बढ़कर एक तिलिस्मी राहत होती है माँ को भी.
कि उसकी ज़रूरत के बहाने कभी ख़त्म न होंगे
उस लमहे गर ख़ुदा भी भेज दे जन्नत का बुलावा
तो नाफ़रमानी तय होगी
माँ भी सोचती है कि एक रात ऐसी आये जो अपने साथ ले चली जाए इतने सालों की थकन, जमा किये सारे अफ़सोस, चुन ले जाए जो तनहाई के बिखरे टुकड़े, सोख ले नमी को छिपा कर रखे गए रुमालों से.. जो बस खाली कर दे भरे जी को, और सुबह की हथेली पर रख जाए खूब सारा सुकून... सो माँ ने सोते वक़्त अपने हाथ में भर ली है नन्हे शैतान की सुर्ख हथेली
कानों में पड़ती है हमराह की आवाज़.. 'आमीन'!
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पता है कि लंचबॉक्स के बारे में बहुत कहा जा चुका..
बहुत लिखा जा चुका है, पर
क्या करें ..
अन्दर से आ रही आवाज़ तो सुननी पड़ती ही है.
जब से देख कर आई हूँ तब से मन में कुछ खालीपन सा पसरा है.. और मन भरा सा भी है.
सच है.. हम अकेले तब ही होते हैं, जब हम अकेलेपन को स्वीकार लें, उसे अपनी नियति मान लें.
ज़िन्दगी दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती, किश्तों में आती है, चुपचाप, मौन कदमों से ..खिड़की के रास्ते.
इसलिए खिड़कियाँ न बंद करना कभी... ये अपनों के आने का शॉर्टकट रास्ता है
और जब सफ़र में हैं तो फिर जो भी होगा देखा जायेगा.. क्योंकि ... शेख की अम्मी कह गयी हैं कि 'अक्सर गलत गाड़ी सही जगह पर पहुंचा देती है'. हो सकता है आप भूटान पहुँच जाएं.. यूँ ही, गैर-इरादतन.
कहीं पर यह फ़िल्म पाउलो की अल्केमिस्ट के पन्नों के बीच लाकर खड़ा कर देती है, सिग्नल्स ऑफ़ नेचर, हम गाड़ी के सही होने और गलत होने में उलझे रह जाते हैं, प्रकृति के इशारे हमें बारबार बुलाते हैं, हमारा दिमाग ज़िरह करता है और अक्सर गाड़ी छूट जाती है.
लेकिन डेस्टिनी ऐसे नहीं छोड़ती आपको.. हाँ अपने इशारों की अनदेखी के लिए सज़ा ज़रूर देती है...निर्मम!
अन्दर से आ रही आवाज़ तो सुननी पड़ती ही है.
जब से देख कर आई हूँ तब से मन में कुछ खालीपन सा पसरा है.. और मन भरा सा भी है.
सच है.. हम अकेले तब ही होते हैं, जब हम अकेलेपन को स्वीकार लें, उसे अपनी नियति मान लें.
ज़िन्दगी दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती, किश्तों में आती है, चुपचाप, मौन कदमों से ..खिड़की के रास्ते.
इसलिए खिड़कियाँ न बंद करना कभी... ये अपनों के आने का शॉर्टकट रास्ता है
और जब सफ़र में हैं तो फिर जो भी होगा देखा जायेगा.. क्योंकि ... शेख की अम्मी कह गयी हैं कि 'अक्सर गलत गाड़ी सही जगह पर पहुंचा देती है'. हो सकता है आप भूटान पहुँच जाएं.. यूँ ही, गैर-इरादतन.
कहीं पर यह फ़िल्म पाउलो की अल्केमिस्ट के पन्नों के बीच लाकर खड़ा कर देती है, सिग्नल्स ऑफ़ नेचर, हम गाड़ी के सही होने और गलत होने में उलझे रह जाते हैं, प्रकृति के इशारे हमें बारबार बुलाते हैं, हमारा दिमाग ज़िरह करता है और अक्सर गाड़ी छूट जाती है.
लेकिन डेस्टिनी ऐसे नहीं छोड़ती आपको.. हाँ अपने इशारों की अनदेखी के लिए सज़ा ज़रूर देती है...निर्मम!
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लंच बाक्स ! क्या बात है!
ReplyDeleteज़िन्दगी कई सारे छोटे छोटे अफ़सोस से सजा एक गुलदस्ता है। सच कहा....
ReplyDeleteसुमन..
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