पागल हैं घड़ी की तीनों सूइयां
और हफ्ते के सारे दिन
साल के सब महीने भी हैं पागल
दौड़ते रहते हैं एक दूसरे के पीछे बेतरह
जबकि बदलता कुछ भी नहीं ...
सिवा उनके
कि हम भी कहाँ बदल पाते हैं कुछ
सिवा खुद के
नवंबर कभी नहीं आता फरवरी से पहले
और किसी किसी महीने की प्रतीक्षा
बनी रहती है शाश्वत
कभी पूरी न होने के लिए
जैसे किसी उलझन में
हाथ से हर बार फिसल जाता है सितम्बर
खाली खाली, बेमानी
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हर सप्ताह में एक दिन
बुद्ध हो जाना
और फिर लौट आना
ज़िन्दगी के कारखाने में
खाली कासे में भर लेना प्रेम ज़रा सा
फिर देखना उसको रीतते हुए
हर सातवें रोज देना इच्छाओं का अर्घ्य
हर सातवें रोज करना वैराग्य का आचमन
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एक छोटे से अंतराल के बीच सांझ ढलने लगती है रात में..
एक छोटे से अंतराल के बीच खिले हुए फूल से झरने लगती हैं पंखुरियां
एक छोटे से अंतराल के बीच रुकी हुई गाड़ी छोड़ देती है प्लेटफॉर्म
एक छोटे से अंतराल के बीच माँ की गोद में खेलता बच्चा चला जाता है नींद के गाँव
एक छोटे से अंतराल के बीच हम टूट जाता है मैं और तुम में
एक छोटे से अंतराल के बीच हो जाती है जीवन की मृत्यु
एक छोटे से अंतराल के बीच कोई कुछ नहीं रह जाता किसी का
और
एक छोटे से अंतराल के बीच उदासी बन जाती है निराशा
* * *

मुझे आपकी ये कविताएँ पसन्द आईं, जो निश्चित ही ’बक-बक’ नहीं हैं। आपको कविताएँ नियमित रूप से लिखनी चाहिए।
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