पिछली बार दो ख़त पढ़े थे हमने, बचे हुए तीनों ख़त इस बार.
दुःख का महीना
ये सितम्बर का महीना है माँ,
और आ गया है दुःख अपने आवरण में लिपटा तोहफ़ा लेकर.
छोड़ जाता है मेरी खिडकियों पर अपने आंसू और फ़िक्र.
ये सितम्बर है, पर कहाँ है दमिश्क?
कहाँ है अब्बू और उनकी आँखें.
कहाँ है उनकी आँखों का रेशमी स्पर्श?
और उनकी कॉफ़ी से उठती ख़ुशबू भी अब कहाँ है?
ख़ुदा उन्हें जन्नत अता करे
हमारे बड़े से घर का विस्तार कहाँ रहा माँ,
अब वहां वो सुकून कहाँ रहा.
खिली हुई कोंपलों की गुदगुदी से
हँसती सीढ़ियाँ कहाँ हैं,
कहाँ है मेरा बचपन.
बिल्ली को पूँछ से खींचता हुआ मैं
बेलों से तोड़कर अंगूर खाता
और नीले फूल चुराता हुआ.
***
मार दिया अपने प्रेम से
दमिश्क, दमिश्क
कैसी नज़्में लिखी हैं हमने
अपनी आँखों के भीतर.
कितनी प्यारी थी वो बच्ची जिसे
सलीब पर चढ़ा दिया हमने.
हमने टिका दिए अपने घुटने
उसके पैरों पर,
और उसके प्रेम में घुलते रहे धीरे धीरे
तब तक
जब तक हमने मार न डाला उसे
अपने प्रेम से.
***
घर के लिए
उस घर के लिए मैं प्यारी यादें भेजता हूँ
जिसने हमें प्यार सिखाया और सिखाई रहमदिली
आपके सफ़ेद फूलों को याद भेजता हूँ
जो आस पड़ोस के सब घरों में सबसे अच्छे हैं
मेरे बिस्तर, मेरी किताबें
और गली के बच्चों को भी.
उन सारी दीवारों को जिन्हें हम अपनी लिखावट के शोर से भर दिया करते थे
बालकनी में अलसियाई पड़ी बिल्ली को
पडोसी की खिड़की पर चढ़ते हुए नीले फूलों की लतर को,
इन सबको मैं याद भेजता हूँ.
दो साल हो गय माँ
और दमिश्क का चेहरा एक चिड़िया की तरह
खोदता रहता है मेरी आत्मा को,
कुतरता है अतीत पर पड़े पर्दों को और,
अपनी कोमल चोंच से काटता है मेरी उंगलियाँ.
दो साल हो गए माँ,
जबसे दमिश्क की खुशबु,
दमिश्क के घर
रह रहे हैं मेरी कल्पनाओं में.
दमिश्क की मस्जिदों में, खम्भों पर लगी बत्तियां
ही रौशन करती हैं हमारा रास्ता,
लहरों के दरम्यान.
जैसे कि अमावी के खम्भों की बुनियाद
हमारे सीने में हो.
जैसे वहां के बगीचों की ख़ुशबू अब भी समाई हो रूह में.
जैसे दमिश्क की रौशनियाँ और चट्टानें
सब मेरे साथ आ गयी हैं.
***
(लूसी विलियम का बनाया यह चित्र दमिश्क की एक मस्जिद का है, साभार गूगल से)

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