(1)
‘गर्मियों में’
गर्मियों में
तुम्हारे ख़यालों में घिरा
लेटा रहता हूँ मैं साहिल पर
अगर कभी कह दूँ मैं सागर को
कि किस तरह चाहता हूँ तुम्हें
तो वो छोड़ देगा अपने साहिल को
अपनी सीपियों और मछलियों को भी छोड़कर
चल देगा मेरे पीछे-पीछे.
तुम्हारे ख़यालों में घिरा
लेटा रहता हूँ मैं साहिल पर
अगर कभी कह दूँ मैं सागर को
कि किस तरह चाहता हूँ तुम्हें
तो वो छोड़ देगा अपने साहिल को
अपनी सीपियों और मछलियों को भी छोड़कर
चल देगा मेरे पीछे-पीछे.
(2)
‘तुम्हे चूमते हुए हरबार’
तवील जुदाई के बाद
जब भी चूमता हूँ तुम्हें
खुद को इतना उतावला महसूस करता हूँ
जैसे कोई प्रेमी बेचैन हो
अपनी चिट्ठी को
लाल डब्बे में डाल देने के लिए.
जब भी चूमता हूँ तुम्हें
खुद को इतना उतावला महसूस करता हूँ
जैसे कोई प्रेमी बेचैन हो
अपनी चिट्ठी को
लाल डब्बे में डाल देने के लिए.
(3)
‘मेरे महबूब’
मेरी महबूब
गर तुम भी मेरे प्यार में
मेरी तरह पागल होती
तो फेंक आती अपने सारे गहने
बेच आती कंगन
और सुकून से सो जाती मेरी आँखों में.
गर तुम भी मेरे प्यार में
मेरी तरह पागल होती
तो फेंक आती अपने सारे गहने
बेच आती कंगन
और सुकून से सो जाती मेरी आँखों में.
(4)
‘लैम्प और रौशनी’
जैसे नोटबुक से ज़्यादा ज़रूरी है कविता
और लबों से ज़्यादा ज़रूरी है बोसा.
जो ख़त मैंने तुम्हें लिखे हैं
वे हमारे वज़ूद से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं
सिर्फ़ ये ख़त ही तो वो दस्तावेज़ हैं
जहाँ लोग खोज सकेंगे
तुम्हारी ख़ूबसूरती
और मेरे पागलपन को
(5)
‘मेरे महबूब ने पूछा’
मेरे महबूब ने पूछा मुझसे
कि “क्या फर्क है मुझमें और आसमान में?”
मैंने कहा.. मेरी जान फ़र्क ये है कि
जब तुम हंसती हो
तो
मैं भूल जाता हूँ आकाश को.
कि “क्या फर्क है मुझमें और आसमान में?”
मैंने कहा.. मेरी जान फ़र्क ये है कि
जब तुम हंसती हो
तो
मैं भूल जाता हूँ आकाश को.
(6)
‘आज़माइश’
पूरब तक पहुँचते हैं मेरे गीत
कुछ उनकी तारीफ़ करते हैं
और कुछ भेजते हैं कोसने
मैं कृतज्ञ होता हूँ उन सब के प्रति
क्योंकि मैंने हर उस औरत के
रक्त का बदला लिया है जो मारी गयी है
और डरी हुई औरतों को मैंने दी है पनाह
उन गीतों में
मैंने साथ दिया है
औरतों के बाग़ी दिलों का
और तैयार हूँ इस ख़ातिर कोई भी कीमत चुकाने को
मर जाने में मुझे सुकून है
गर मेरी जान मोहब्बत में जाए तो
क्योंकि मैं प्रेम का हिमायती हूँ
और जो मैं ये न हुआ
तो मैं नहीं रह जाऊँगा ‘मैं’.
कुछ उनकी तारीफ़ करते हैं
और कुछ भेजते हैं कोसने
मैं कृतज्ञ होता हूँ उन सब के प्रति
क्योंकि मैंने हर उस औरत के
रक्त का बदला लिया है जो मारी गयी है
और डरी हुई औरतों को मैंने दी है पनाह
उन गीतों में
मैंने साथ दिया है
औरतों के बाग़ी दिलों का
और तैयार हूँ इस ख़ातिर कोई भी कीमत चुकाने को
मर जाने में मुझे सुकून है
गर मेरी जान मोहब्बत में जाए तो
क्योंकि मैं प्रेम का हिमायती हूँ
और जो मैं ये न हुआ
तो मैं नहीं रह जाऊँगा ‘मैं’.

Mesmerised!
ReplyDeleteअनुपमा: तुम्हारे लौटने से कई ब्लॉग फिर से खिल उठे हैं.
Deleteअनुशील महकने लगा है :)
This comment has been removed by the author.
Deleteभावना का मतलब ही है कल्पना।
ReplyDeleteमारक अनुवाद है आपका। क्या शब्द बा शब्द कविता रस भाव को उकेरा है अनुमान हमें। कब्बानी पढने की इच्छा बलवती हो रही।
रेगार्ड्स
कंडवाल मोहन मदन
कंडवाल जी: शुक्रिया!! पढ़ने वालों के संस्कारों से अनुवाद जीवित हैं :)
Deleteबहुत सुंदर कविताएँ और बेहतरीन अनुवाद.
ReplyDeleteइन्हें कभी दस्तक पर शेयर करने की इजाजत दें...
अनिल जी: ज़रूर.. अनुवाद दूर दूर तक पहुंचें यही तो मेरा उद्देश्य है. आप ज़रूर इन्हें ले सकते हैं, मुझे खुशी होगी.
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