Oct 30, 2014

पागल हैं घड़ी की तीनों सूइयां



पागल हैं घड़ी की तीनों सूइयां 
और हफ्ते के सारे दिन 
साल के सब महीने भी हैं पागल 
दौड़ते रहते हैं एक दूसरे के पीछे बेतरह 
जबकि बदलता कुछ भी नहीं ... 
सिवा उनके 
कि हम भी कहाँ बदल पाते हैं कुछ 
सिवा खुद के

नवंबर कभी नहीं आता फरवरी से पहले 
और किसी किसी महीने की प्रतीक्षा
बनी रहती है शाश्वत
कभी पूरी न होने के लिए
जैसे किसी उलझन में
हाथ से हर बार फिसल जाता है सितम्बर
खाली खाली, बेमानी

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हर सप्ताह में एक दिन
बुद्ध हो जाना
और फिर लौट आना
ज़िन्दगी के कारखाने में

खाली कासे में भर लेना प्रेम ज़रा सा
फिर देखना उसको रीतते हुए

हर सातवें रोज देना इच्छाओं का अर्घ्य
हर सातवें रोज करना वैराग्य का आचमन

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एक छोटे से अंतराल के बीच सांझ ढलने लगती है रात में.. 

एक छोटे से अंतराल के बीच खिले हुए फूल से झरने लगती हैं पंखुरियां

एक छोटे से अंतराल के बीच रुकी हुई गाड़ी छोड़ देती है प्लेटफॉर्म

एक छोटे से अंतराल के बीच माँ की गोद में खेलता बच्चा चला जाता है नींद के गाँव

एक छोटे से अंतराल के बीच हम टूट जाता है मैं और तुम में 

एक छोटे से अंतराल के बीच हो जाती है जीवन की मृत्यु

एक छोटे से अंतराल के बीच कोई कुछ नहीं रह जाता किसी का

और

एक छोटे से अंतराल के बीच उदासी बन जाती है निराशा

                                                          

                                                                       * * *



Oct 25, 2014

कहीं दूर न जा..



कहीं दूर न जाना, एक दिन के लिए भी नहीं, क्योंकि
क्योंकि,-- इसे कह पाना मैं शायद नहीं जानता:
पर कितना तवील होता है एक दिन और फिर
मैं तुम्हारी राह देखता रहूँगा,
जैसे किसी सूने स्टेशन में खड़ा
रस्ता देखता रहूँ उन रेलगाड़ियों का
जो खड़ी हों कहीं और ही
आँखें मूंदें, ऊंघती सी


मुझे छोड़ के न जाना, एक वक्फ़े को भी नहीं,
क्योंकि गर तुम गयी तो एक साथ दौड़ पड़ेंगी दर्द की नन्हीं बूँदें,
ठिकाने की खोज में भटकता धुंआ कर लेगा घर मुझमें
और घुट के रह जाएगा बेचैन दिल मेरा.


काश! कि सागर-तट पर दिखता तेरा साया कभी न घुले
कभी न हिलें इस वीरान दूरी में तुम्हारी पलकें .
एक लमहे को भी तुम मुझे छोड़ कर न जाना.. जानां
क्योंकि, उस एक पल में इतनी दूर तुम हो जाओगी
कि भटक जाऊँगा मैं इस कायनात की भूलभुलैया में
पूछता फिरूंगा ..

कि क्या तुम लौट कर आओगी ?
या छोड़ जाओगी मुझे..
मौत का मुन्तज़िर करके ?


Oct 21, 2014

चिलम में दुःख कोई फिर भर रहा था


जो सच नहीं हो सका, जो मुमकिन नहीं हो सका, वो ही ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत पल रहा होता, ऐसा सोचना और उसे न जीते हुए भी हर रोज़ जीना लगभग यही तौर है हमसब की ज़िन्दगी का. जैसे यूँ कहना कि फलां बात या फलां शख्स को तो हम भूल गए, पर भूलने के लिए कितनी बार याद किया होगा, इसका कोई हिसाब नहीं.
सारे अफ़सोस जुटाना रोज़ और उन पर फिर फिर करना अफ़सोस, ये बेगैरत सी हरकत लगभग वैसी ही ज़रूरी है, जैसे सुबह आँख खुलने को एक प्याली चाय.

हर रोज़ हौसलों को यकजा करना, हर शाम खुद को बिखरा हुआ पाना, जो न हो ये सब तो किस कारोबार में गुज़रेंगे ये लम्बे दिन. असल बात तो ये है कि बहुत सारी पीड़ाओं और दिलशिकनी के किस्सों के बावजूद भी जब हम सुबह उठते हैं तो हमारे पहलू में एक उम्मीद मुस्कुराती मिलती है कि आज का दिन तुम्हारा है, जीत लो इसे! जैसे रॉबिन विलियम्स ने ‘डेड पोएट्स सोसाइटी’ में कहा था Carpe Diem!! (Seize the Day!)

सुबह का रंग कभी फ़ीका नहीं पड़ता, उसके रंगों से फूटती किरणें ही तो तय करती हैं हमारे दिन का रोड-मैप. खिड़की पर उतरता सूरज, ठंडी हवा का लम्स, गमलों में उगा हरापन.. गोरा निखरा आसमान इन सारी नेमतों के हक़दार हम क्यों हुए भला. दरअसल, जो अबूझ है, उसमें ही ज़िन्दगी और सुकून के कतरे हैं. धूप और पानी के रंगों को न जानना कितना सुकूनपरस्त है, कुछ तो बचा है जो सिर्फ महसूस करने की चीज़ है, जिस दिन इनके रंगों के लिए नाम तलाश लिए हमने, उस दिन ही शुरू हो जाएगा नकली धूप का कारोबार.

दुनिया में फैले इतने सारे नकलीपन के बावजूद कुछ असली जो हम बचा पाते हैं, वो ख़ालिस लम्हे ही तो याद कहलाते हैं. यादों के रंग बिरंगे पत्थर जमा हैं एक पोटली में, रोज़ उनको टटोलना भी कैसी आदत है. उनके नुकीले सिरों को नर्म हथेली पर महसूस करना और इस तरह पुरानी तकलीफ़ों को ज़िन्दा रखने की ज़िद दरअसल एक खेल है, जो खेल हम हार जाने तक खेलते हैं. इस खेल में जीतता तो कोई भी नहीं. क्योंकि हमारे सामने जो होता है वो एक मायावी पर्दा होता है, दरअसल इस खेल के दोनों तरफ हम ही होते हैं. और दोनों तरफ से ही हारते हैं.. ये हार ही तो अगली बार जीतने के लिए बेचैन रखती है. सुख की आकांक्षा दरअसल दुःख से ही तो उपजती है.. इसलिए ज़रूरी है कि हम दुःख और उदासियों को भी उनकी पूरी शिद्दत से महसूस करें और जियें. जो हम उन्हें जल्दी दूर करना चाहेंगे, ज़िन्दा उखाड़ना चाहेंगे तो दर्द बढ़ेगा ही, दुखों का निर्वाण भी उनके पूरेपन में है. खुशियों के कश जो भरने हैं तो उदास दिनों की राख जमा रखना, उदासी की तासीर हमेशा खुशियों से कहीं गहरी होती है.. 



Oct 20, 2014

हमेशा

मैंने जो देखा
उससे कोई ईर्ष्या नहीं मुझे.

अपने कन्धों पर किसी
मर्द को लिए आओ,
या सैकड़ों मर्दों को अपनी ज़ुल्फों में उलझाकर लाओ,
ले आओ हज़ारों मर्दों को अपने सीने और तलवों के बीच 
डूबे हुए मर्दों की लाशों से भरी
एक नदी की तरह आओ
जो घुल जाती है उन्मत्त समुद्र में
शाश्वत लहर में, समय में!

ले आओ उन सब को
वहीँ, जहाँ मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ;
हम फिर भी एकाकी रहेंगे सदा,
रहेंगे सिर्फ तुम और मैं
अकेले इस धरती पर

अपने जीवन की शुरुआत के लिए! 






Oct 18, 2014

कई दिनों से मन कहता है कि...


जो बीत गया अभी अभी वो दोबारा न आएगा कभी और आया तो ठीक वैसा न रहेगा जैसा अभी गुज़रा था. इस तरह सोचती हूँ तो लगता है कि हम कितना कुछ खोते हुए भी ज़िन्दगी में आगे बढ़ते जा रहे हैं बाखुशी.

रुकना और बढ़ जाना भी कैसी बातें हैं, किसी स्मृति से छिटके हुए पल में जब दोबारा जाती हूँ तो लगता है कि जीवन वहीँ तो ठिठका था बरसों से... ये आना जाना अनवरत है और इनके बीच भी जीवन तमाम नए किस्से पिरोता रहता है अपनी तस्बीह में.

कई दिनों से मन कहता है कि जीने के लिए थोड़ा सा पागल हो जाना बेहतर है क्योंकी ऐसा न होने से पूरे पागल हो जाने का ख़तरा बना ही रहता है।

ज़िन्दगी कई सारे छोटे छोटे अफ़सोस से सजा एक गुलदस्ता है, जैसे मेरा एक ताज़ा अफ़सोस कि आज शाम गाड़ी में बैठे जब मैं अपने शहर के सबसे ख़ास चौराहे से गुज़री तो उसकी वो तस्वीर कहीं अटक गयी ज़ेहन में और दिल में टीस है कि अब उसको कभी मैं ठीक वैसा ही न देख पाउंगी जैसा वो आज शाम था। शायद अगली बार जब देखूं तो आसमान का रंग कुछ मद्धम हो या कुछ गहरा ही हो जाए. शायद किनारे वाला बरगद का हरा साया तब इस तरह पसरा न मिले सड़क पर, शायद बन्दर वाला मदारी अगली बार न खड़ा हो वहां, और न जाने क्या क्या डर... कितने अफ़सोस
जिसको सुबह वाली गाड़ी पकड़नी हो उसकी नींद यूँ ही हवा सी बहने लगती है



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क्या बहुत गहरी होती है वो नींद जो माँ का आँचल हाथ में थामे सो जाने पर आती है 
क्या बहुत मीठी, सुकून भरी होती होगी, वो रेशमी आँचल से उठकर बच्चे की शरारती आँखों में उतरती नींद
हो न हो, वो रात खिड़की से बाहर गिरा देती होगी 
पिछले दिन की सारी थक, सारे अफ़सोस..

पर क्या जाने क्या है वो नींद?? 24 साल पीछे जाकर सोचना होगा कि छः बरस का बच्चा क्यों हर रात पूरे जोर से थामे रहता है किसी दुपट्टे की कोर?

भोले शैतान की आँखों में दफ़अतन उतर आई उस नींद का असर दो रूहों पर आता है 
कि जो सुकून उसको मिलता है उससे कहीं बढ़कर एक तिलिस्मी राहत होती है माँ को भी. 
कि उसकी ज़रूरत के बहाने कभी ख़त्म न होंगे 

उस लमहे गर ख़ुदा भी भेज दे जन्नत का बुलावा 
तो नाफ़रमानी तय होगी

माँ भी सोचती है कि एक रात ऐसी आये जो अपने साथ ले चली जाए इतने सालों की थकन, जमा किये सारे अफ़सोस, चुन ले जाए जो तनहाई के बिखरे टुकड़े, सोख ले नमी को छिपा कर रखे गए रुमालों से.. जो बस खाली कर दे भरे जी को, और सुबह की हथेली पर रख जाए खूब सारा सुकून... सो माँ ने सोते वक़्त अपने हाथ में भर ली है नन्हे शैतान की सुर्ख हथेली

कानों में पड़ती है हमराह की आवाज़.. 'आमीन'!

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पता है कि लंचबॉक्स के बारे में बहुत कहा जा चुका.. बहुत लिखा जा चुका है, पर क्या करें ..
अन्दर से आ रही आवाज़ तो सुननी पड़ती ही है.

जब से देख कर आई हूँ तब से मन में कुछ खालीपन सा पसरा है.. और मन भरा सा भी है. 
सच है.. हम अकेले तब ही होते हैं, जब हम अकेलेपन को स्वीकार लें, उसे अपनी नियति मान लें.

ज़िन्दगी दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती, किश्तों में आती है, चुपचाप, मौन कदमों से ..खिड़की के रास्ते.
इसलिए खिड़कियाँ न बंद करना कभी... ये अपनों के आने का शॉर्टकट रास्ता है  

और जब सफ़र में हैं तो फिर जो भी होगा देखा जायेगा.. क्योंकि ... शेख की अम्मी कह गयी हैं कि 'अक्सर गलत गाड़ी सही जगह पर पहुंचा देती है'. हो सकता है आप भूटान पहुँच जाएं.. यूँ ही, गैर-इरादतन. 

कहीं पर यह फ़िल्म पाउलो की अल्केमिस्ट के पन्नों के बीच लाकर खड़ा कर देती है, सिग्नल्स ऑफ़ नेचर, हम गाड़ी के सही होने और गलत होने में उलझे रह जाते हैं, प्रकृति के इशारे हमें बारबार बुलाते हैं, हमारा दिमाग ज़िरह करता है और अक्सर गाड़ी छूट जाती है. 
लेकिन डेस्टिनी ऐसे नहीं छोड़ती आपको.. हाँ अपने इशारों की अनदेखी के लिए सज़ा ज़रूर देती है...निर्मम
!

* * *  






Oct 16, 2014

तुम्हारी बाँहों में



मैं सो जाता हूँ तुम्हारी बाहों के घेरे में
ये सुकून है

तुम सो जाती है मेरी बाहों में
ये सुकून है

तुम्हारी बाहों में, मैं हो जाता हूँ एक छोटा बच्चा
जो ख़ामोश है

मेरी बाहों में तुम हो जाती हो एक बच्ची
जिसे सुनता हूँ मैं डूबकर

तुम भर लेती हो मुझे बाहों में
जब डरा हुआ होता हूँ मैं

और मैं जब भर लेता हूँ तुम्हें बाहों में
तो फिर किसी बात से नहीं डरता मैं

तुम्हारी बाहों में
मौत की घनी ख़ामोशी भी
डरा नहीं सकेगी मुझे

तुम्हारी बाहों में
मैं मौत को भी हरा दूंगा
ये सपना है मेरा 


Oct 14, 2014

जो तुम भूल जाओ मुझे


मैं चाहता हूँ कि ये जान लो तुम

तुम्हे क्या खबर कि इस ओर हालत क्या है:
गर मैं देखता हूँ चमकीले चांद को,
या देखता हूँ अपनी खिड़की पर धीमे पतझड़ की लाल शाख को, 
गर मैं छू लूँ आग के नज़दीक बिखरी राख को
या लकड़ी के सिकुड़े जिस्म को,
तो ये हर चीज़ मुझे तुम तक ले जाती है,
जैसे कि, खुशबुएं, रौशनी, धातुएं, और हर शय
कोई छोटी नाव हो, जो
ले जाती है मुझे तुम्हारे उन टापूओं की ओर
जो बैठे हैं मेरी प्रतीक्षा में

खैर...
गर धीरे-धीरे तुम अब न चाहो मुझे
तो मैं भी तुमसे चाहत छोड़ दूंगा धीरे-धीरे

गर कभी अचानक
तुम मुझे भूल जाओ
तो फिर तलाश भी न करना मुझे
क्योंकि तब तक मैं भी भुला दूंगा तुम्हें

गर मेरे जीवन में हवाओं की तरह बहती
ये अतीत की परछाइयाँ, उनके सिलसिले
तुम्हें लगते हों बहुत लम्बे.. या लगे मेरा दीवानापन,
और तुम कर लो फैसला
मुझे दिल के साहिल पर छोड़ जाने का,
जहाँ जमा हैं मेरी जड़ें..
तो जान लो कि उसी दिन,
उसी वक़्त
मैं हटा लूँगा अपनी बाहें
और मेरी जड़ें भी निकल पड़ेंगी
दूसरी ज़मीन की तलाश में.

लेकिन
गर हर दिन,
हर वक़्त,
एक अतृप्त मीठे एहसास की तरह
तुम महसूस करो कि हमारी किस्मत में लिखा है एक-दूजे का साथ,
गर हर दिन मुझे सोचते हुए एक फूल खिल जाए तुम्हारे होठों पर,
आह मेरे प्रेम.. मेरे अपने,
तो मुझमें फिर से जल उठेगा वही शोला
न कुछ बुझा होगा मेरे अन्दर ना ही कुछ भुलाया होगा मैंने,
प्रिये! मेरा प्रेम तो पलता है तुम्हारे प्रेम से
इसलिए जबतलक तुम हो,
ये प्रेम भी रहेगा तुम्हारी बांहों में
मेरी बांहों के साथ.



Oct 13, 2014

मैं बे-हुनर ही सही.. मेरी कुछ ज़रूरत तो थी


हर रंग एक दिन ज़र्द पड़ जाता है. बचा वही रह जाता है जो हम उस रंग से चुराकर अलग रख लेते हैं, कहीं टांक लेते हैं स्मृतियों में, कहीं संजो लेते हैं तहों के भीतर, धूप-छाँव से दूर अपने ही अस्तित्व के आलोक में वे रंग ज़िंदा दिनों के लिए ज़रूरी असबाब होते हैं.

ऐसी छोटी छोटी बहुत सी चीज़ें इकट्ठा करते हुए बीता है अब तक सफ़र, कहने को तो बसर और गुज़र ही हो रही थी .. पर इस खजाने में सामां बढ़ता ही गया. कि अब ज़रूरत लगने लगी तहों में बसे उन रंगों को नए सिरे से सँभालने की, तरतीब में रखने की. एकबार फिर से उनके आलोक में खुद को देखने की.

इतनी मुद्दत बाद जब इस तरह से सोचा और कदम बरबस पीछे की ओर जाने लगे तो पाया कि ऐसी कितनी ज़रूरी चीज़ें हैं, ख़याल हैं, सांस लेते टुकड़े हैं जिन्हें तरतीब में लगाना ज़रूरी है, उनकी धडकनों को गिनना ज़रूरी है अपनी धड़कन की रफ़्तार से उनकी धड़कन को मिलाना ज़रूरी है. खूब सारे रंग बिरंगे टुकड़े देखकर एकबार को यक़ीन न हुआ कि ये सामान अपना ही है. ये सबकुछ अपना जिया और सोचा है. ऐसे बहते हुए अचानक एक ही लफ्ज़ आया मन में ‘कतरन’ कि ये सब मेरी ज़िन्दगी की कतरनें ही तो हैं. कितने सुकून भरे पल इन्हें दिए हैं, कभी इनके तसव्वुर में कितने बेचैन दिन काटे हैं, कितनी ख़ूबसूरत यादें टांकी हैं इनपर.

तो बस जिन्हें संजोती आयी, वो तो हैं ही और आगे भी ऐसी कतरनों को ज़ाया नहीं होने देना है.

‘कतरन’ के नाम से अब बचा कर रखूंगी सारे रंग

कतरन पर आपको मिलेंगे ज़िन्दगी को लिखे गए कुछ ख़त ('ऑलमोस्ट बकबक'), कुछ मेरी पसंद की अंग्रेज़ी कविताओं का तर्जुमा, कुछ ख़ालिस कविता जैसी चीज़ भी मिल सकती है, और मिलेगा ढेर सारा पागलपन, बेबात की बातें और न जाने क्या क्या हो, जिससे अभी ख़ुद मैं भी अनजान ही हूँ.
  
अपने बारे में कुछ कहना सदा ही असहज रहा है, जैसे खुद को पहचानना भी अक्सर असहज करता आया है मुझे. पर अब तक खुद में जो भी पाया है उससे सुकून में हूँ. छोटे और पुराने शहरों की आदत है, कि जहाँ हाथ बढ़ाओ तो किसी दोस्त से ही टकराये. मेरी एक दुनिया है और उसके अन्दर न जाने कितनी और दुनियाँ हैं, उदासियों की, खुशियों की, ख़्वाबों की, बरबादियों की.. हर दुनिया में बहुत सारी मैं हूँ और बाकी सबकुछ की तरह ये भी तो अनिश्चित ही है कि वे मुझमें हैं या मैं उनमें हूँ. पर ख़ास बात उनका होना है. उनके होने से मैं हूँ, मेरे होने से ये जगह वज़ूद में आई है. शायद इस जगह पर सबकुछ साथ साथ मिल सकेगा और साथ होते हुए भी किसी का रंग न खोएगा, न ज़र्द होगा..  


[ब्लॉग के हेडर की तस्वीर के लिए कुंवर रवीन्द्र भाई का शुक्रिया और उसे मेरे माफिक रंग-रूप और आकार देने के लिए प्रिय निशिथ का]