Oct 25, 2014

कहीं दूर न जा..



कहीं दूर न जाना, एक दिन के लिए भी नहीं, क्योंकि
क्योंकि,-- इसे कह पाना मैं शायद नहीं जानता:
पर कितना तवील होता है एक दिन और फिर
मैं तुम्हारी राह देखता रहूँगा,
जैसे किसी सूने स्टेशन में खड़ा
रस्ता देखता रहूँ उन रेलगाड़ियों का
जो खड़ी हों कहीं और ही
आँखें मूंदें, ऊंघती सी


मुझे छोड़ के न जाना, एक वक्फ़े को भी नहीं,
क्योंकि गर तुम गयी तो एक साथ दौड़ पड़ेंगी दर्द की नन्हीं बूँदें,
ठिकाने की खोज में भटकता धुंआ कर लेगा घर मुझमें
और घुट के रह जाएगा बेचैन दिल मेरा.


काश! कि सागर-तट पर दिखता तेरा साया कभी न घुले
कभी न हिलें इस वीरान दूरी में तुम्हारी पलकें .
एक लमहे को भी तुम मुझे छोड़ कर न जाना.. जानां
क्योंकि, उस एक पल में इतनी दूर तुम हो जाओगी
कि भटक जाऊँगा मैं इस कायनात की भूलभुलैया में
पूछता फिरूंगा ..

कि क्या तुम लौट कर आओगी ?
या छोड़ जाओगी मुझे..
मौत का मुन्तज़िर करके ?


4 comments :

  1. रस्ता देखता रहूँ उन रेलगाड़ियों का
    जो खड़ी हों कहीं और ही
    आँखें मूंदें, ऊंघती सी

    सुन्दर अनुवाद भावना , कविता तो है ही लाजबाब

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  2. गर तुम गयी तो एक साथ दौड़ पड़ेंगी दर्द की नन्हीं बूँदें,
    ठिकाने की खोज में भटकता धुंआ कर लेगा घर मुझमें
    और घुट के रह जाएगा बेचैन दिल मेरा... यह कविता मुझे याद है. इसका अनुवाद बहुत खूबसूरती से किया है भावना सो इसके लिए बधाई.

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