Nov 29, 2014

माँ को लिखे पांच ख़त

नौकरी के सिलसिले में निज़ार को ज़्यादातर अपने घर से दूर ही रहना होता था. इस दूरी ने लगाव को और भी गहरा किया था. वो दमिश्क में न थे लेकिन दमिश्क उनके भीतर सासें लेता था. वहां की पुरकैफ़ हवायें, उस शहर का पुरानापन, इमारतें सबकुछ एक चलचित्र की तरह  गुज़रता रहता था उनके भीतर लम्हा दर लम्हा. किसी अनवरत याद की शक्ल में..  शायद ऐसी ही यादों के भँवर से घिरे जाने पर उन्होंने किसी रोज़ लिखी होंगीं ये चिट्ठियां  'माँ को लिखे पांच ख़त'

इस ख़त के दो टुकड़े यहाँ कतरन पर



माँ 


किसी पीर सी निश्चल मेरी प्यारी माँ को
इस ख़ूबसूरत सुबह का सलाम भेजता हूँ
दो बरस हो गए माँ
जब ये लड़का निकल गया था
किसी समुद्री जहाज में बैठकर
अपनी काल्पनिक यात्रा के लिए.
उस बात को दो बरस हो गए माँ
जब उसने अपने सामान में छिपा कर रखी थी
अपने वतन की हरियाली भरी सुबह,
वहां की रात के सितारे, नदियाँ,
और दूर तक फैले खसखस के
ढेर सारे लाल फूल.
दो बरस हुए माँ जब वह अपने कपड़ों में
छुपा कर लाया था
पुदीने और अजवायन के गुच्छे
और दमिश्क का एक नीला फूल.

***





अकेला मैं 



मैं अकेला हूँ.
मेरी सिगरेट से उठता धुँआ उकताया हुआ है,
और वह जगह भी मुझसे ऊबी हुई है, जहाँ मैं बैठा हूँ
मेरे दुःख चिड़ियों के झुण्ड की तरह खोज रहे हैं 
इस मौसम में उगने वाले अनाज के खेत.
मैंने यूरोप की औरतों को जाना है
मैं जान पाया हूँ उनकी क्लांत सभ्यता को
मैंने भारत घूमा और चीन देखा,
दुनिया का पूरा पूर्वी हिस्सा घूम लिया मैंने, और कहीं भी मुझे न मिली
एक ऐसी औरत जो मेरे सुनहरे बालों में कंघी फिरा दे
ऐसी औरत जो अपने बटुए में छिपा कर रखती एक टाफी मेरी खातिर
औरत, जो गिरने पर मुझे उठा लेती
और बदन पर कपड़े न होने पर
मुझे पहना देती कपड़े
माँ: तेरा ये बेटा जो समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा था
आज भी उस टाफी के लिए तरसता है.
इसलिए माँ, भला कैसे मैं एक पिता बन जाऊं,
जबकि मैं खुद ही ठहरा हूँ अपने बचपन में.

मैड्रिड की ज़मीन से सुबह का सलाम भेजता हूँ
‘फुलाह’ कैसी है?
मैं आपसे मिन्नत करता हूँ उसका ख़याल रखियेगा
सारे बच्चों में सबसे प्यारी
अब्बू कितना चाहते थे उसे
दुलार में उसे यूँ बिगाड़ रखा था जैसे वह उनकी बेटी हो
सुबह कॉफ़ी पीते वक़्त वे उसे अपने पास बुला लेते थे
वो खुद उसे खाना खिलाते थे और पानी भी खुद ही पिलाते थे
उनकी करुणा का साया हमेशा उसपर बना रहता था
जब अब्बू गुज़र गए
वो हमेशा उनके लौट आने के ख्व़ाब देखती थी
कमरों के कोनों में उन्हें खोजा करती थी
पूछती थी उनके रोब और अखबार के बारे में
और गर्मियों के आने पर, अब्बू की आँखों के नीले
रंग के बारे में सवाल करती थी
सोचती थी कि वह अब्बू की हथेलियों में फिर दे सके 
अपने सुनहरे सिक्के.

***

(बचे तीन ख़त अगली किश्त में) 




2 comments :

  1. बहुत मर्मस्पर्शी

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  2. भावपूर्ण खतों का बेहतरीन अनुवाद ..
    आगे की किश्त का इंतजार ...

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