Dec 4, 2014

यरूशलेम


यरूशलेम

मैं रोया अपने आंसूओं के सूख जाने तक
मोमबत्तियों के बुझ जाने तक मैंने की दुआ
झुका रहा सजदे में जब तक दरकने न लगी ज़मीन
मैंने पूछा मोहम्मद और ईसा के बारे में

ओ यरूशलेम, जिसकी हवा में है पैगम्बरों की ख़ुशबू
जहाँ से सबसे क़रीब है जन्नत
ओ यरूशलेम, दीन के गढ़
एक ख़ूबसूरत बच्चे से तुम, 
झुलस गयी हैं जिसकी उंगलियाँ और झुकी हैं निगाहें

तुम गर्म रेगिस्तान के बीच वह सरसब्ज़ ज़मीन हो
जहाँ से गुज़रते हैं पैगम्बर
आज उदासी पड़ी हैं तुम्हारी गलियां
मातम करती हैं मीनारें
यूँ लगते हो तुम कि किसी जवान लड़की ने पहने हों काले मातमी कपड़े

कहो.. शनिवार की सुबह
कौन बजाता है चर्च में यीशु के जन्म की घंटियाँ?
क्रिसमस की शाम कौन लाता है बच्चों के लिए खिलौने?

ओ यरूशलेम, शोक में डूबे शहर
जैसे आँखों में तैरता एक मोटा आंसू  
जिसके बगैर बेनूर है मज़हबों का वज़ूद
कौन रोकेगा तुम पर होती इस जरहियत को?
तुम्हारी खून से लथपथ दीवारें कौन धोएगा?
कौन करेगा बाइबिल की हिफाज़त?
कौन बचाएगा क़ुरान को?
ईसा की रक्षा कौन करेगा?
और कौन बचाएगा इंसान को?

ओ यरूशलेम, मेरी सरज़मीं
ओ यरूशलेम, मेरी जावेदा मोहब्बत
कल फिर फूलेंगे नींबू के पौधे
और खुशी से झूम रहे होंगे जैतून
तुम्हारी आँखें रक्स करेंगीं
और लौट आएँगे मुहाजिर कबूतर
तुम्हारी मुक़द्दस छतों पर

तुम्हारी सुहानी पहाड़ियों पर
फिर से खेलेंगे तुम्हारे बच्चे
और एक दूजे से मिलेंगे बिछड़े हुए
बाप-बेटे
मेरी सरज़मीं में फिर से होगा अमन
और उगेंगे जैतून.

* * *


6 comments :

  1. हमेशा की तरह कविताओं का चयन व अनुवाद
    बेहतरीन
    ब्लॉग बना कर तुमने सही किया कम से कम तुम्हारा
    सारा काम एक जगह एकत्रित तो रहेगा

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  2. यह पूरी सीरीज पढ़ी है मैंने। कब्बानी तो अद्भुत हैं ही। जिस फेमिनिन भाव दृष्टि के लिए विख्यात हैं वे चाहे वो राजनितिक कविता ही हो। 15 की उम्र में उनकी 25 वर्षीय बहन ने आत्महत्या कर ली थी अपने प्रेमी से शादी न कर पाने के कारण। यह प्रभाव हमेशा रहा उन पर वे कहते भी हैं उनकी मातृभूमि पर प्रेम एक कैदी है जिसे उन्हें आजाद करना है।
    आपके सारे अनुवाद बेहद सुंदर हैं। कब्बानी के प्रशंसक हमेशा कहते हैं कि उनका असल सौंदर्य आप सिर्फ अरबी में देख सकते हो। मैंने तो अंग्रेजी अनुवाद से ही जाना है उन्हें और अब जो यह हिंदी अनुवाद पढ़े,एकदम करीब हैं उनकी सोल के।

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  3. बहुत पहले एक मित्र ने कब्बानी को पढ़ने की सलाह दी थी किन्तु बात आई गई हो गई , पर जब तुम्हारे ब्लाग को पढ़ा तो पढ़ती रह गई...सारे अनुवाद बहुत खूबसूरत हैं .. उनमें शब्द परिवर्तन के बावजूद भावों को बहुत खूबसूरती से सँजो कर रखा है तुमने ... निसंदेह यह सीरिज बहुत ज्यादा पसंद आई है हमें ... आगे भी इंतजार रहेगा ...

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  4. लो पूरा पढ़ डाला , कब्बानी को छुटपुट रूप में [अनुवादित ]ही पढ़ा था अब तक आज एक साथ कई कवितायें इस ब्लॉग में पढ़ीं, एक बात मुझे नज़र आई कि कब्बानी की कविताओं में झंडा उठा कर नारे बाजी नहीं है , विद्रोही या बिरोध को भी वे बड़ी मुलामियत से व्यक्त करते है उसके बावजूद तासीर में तीखापन और मारक क्षमता बरकरार है

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  5. भावना ,कविताओं का चयन और उनका अनुवाद दोनों ही बहुत अच्छा है.
    कब्बानी की कविताएँ बेशक बेहद प्रभावी होती हैं.

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  6. बेहद सुन्दर!
    Keep up the good work dear!

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